गुरुवार, 27 जून 2024

कुड़ुख आदिवासी समुदाय की पशु-पक्षी और जलचर की लोककथा: शक्ति और बुद्धि की जंग-kudukh aadiwasi samuday ki lokakatha: shakti aur buddhi ki jang

 

कुड़ुख आदिवासी समुदाय की पशु-पक्षी और जलचर की लोककथा: शक्ति और बुद्धि की जंग


प्रस्तुति : ज्योति लकड़ा

एक था हाथी। एक था मगर। हाथी जंगल का राजा था और मगर पानी का। एक दिन दोनों मित्र नदी किनारे बैठकर अपनी-अपनी ताकत की बड़ाई कर रहे थे। उनके पास एक कछुआ बैठकर उनकी बातें सुन रहा था। उसे न जाने क्या सूझा कि वह हाथी और मगर के सामने आ डटा और बोला- "आप दोनों के जैसा बलवान सचमुच इस दुनिया में कोई नहीं है। पर क्या आप मेरे साथ एक शर्त लगाएँगे?" इस पर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।

"तुम मुझसे शर्त लगाओगे कछुए भाई?" हाथी ने हँसते-हँसते पूछा। "आप दोनों से ही। देखें हम तीनों में अधिक बलवान कौन है?" कछुए ने धैर्यपूर्वक कहा।

हाथी और मगर को तो विश्वास ही नहीं हुआ। पर फिर भी हाथी ने पूछा- "अच्छा तो पहले किससे शर्त लगाओगे?"

कुछ देर सोचकर कछुआ बोला- "पहले आप से, हाथी भाई।" "तो तैयार हो जाओ लड़ने के लिए।" हाथी चिंघाड़कर बोला। "मैं तो तैयार हूँ लेकिन हम कुश्ती नहीं लड़ेंगे।" कछुआ बोला।

"हाँ! कुश्ती नहीं लड़ेंगे, तो क्या करेंगे?" हाथी ने पूछा। "हम दुश्मन तो हैं नहीं। न ही दुश्मनों की तरह लड़ेंगे। हमें तो बस अपनी ताकत की जाँच करनी है।" कछुए ने समझाया।

"वह कैसे करोगे?" हाथी ने टोका।

"ऐसा करेंगे कि मैं अपने पाँव में एक रस्सी बाँधकर पानी में चला जाऊँगा और उस रस्सी के दूसरे छोर को पकड़कर आप मुझे बाहर खींचें। यदि आपने मुझे पानी से बाहर खींचकर निकाल लिया, तो मैं हारा। न निकाल सके तो मैं जीता। मंजूर है?" "मंजूर है, जा रस्सा ले आ।" हाथी ने कहा। कछुआ एक मोटा रस्सा ले आया। उसने एक सिरा पाँव में बाँधा, दूसरा सिरा हाथी को पकड़ाया। फिर नदी के भीतर चला गया। नदी बड़ी गहरी थी। उसके भीतर एक बड़ी भारी चट्टान थी। कछुए ने रस्सा चट्टान से कसकर लपेट दिया और पानी से बाहर सिर निकालकर हाथी से कहा, "हाथी भाई! अब खींचो।"

हाथी ने सोचा, कछुए को खींचने के लिए ज़ोर लगाने की क्या ज़रूरत है। उसने पहले थोड़ा सा खींचा, पर कछुआ पानी से बाहर नहीं निकला। फिर और खींचा, फिर पूरी ताकत लगा दी पर रस्सा तो हिला ही नहीं। अब तक वहाँ सभी जानवर इकट्ठा होने लगे थे। उन्हें देख हाथी को और गुस्सा आया। उसने इतनी ज़ोर से झटका दिया कि रस्सा खट से टूट गया। हाथी धड़ाम से कुलाटी खाकर ज़मीन पर गिर पड़ा। सारे पशु-पक्षी हा-हा, ही-ही, हू-हू, हैं-हैं कर हँस पड़े। हाथी क्रोध के मारे चिंघाड़ते हुए धूल उड़ाने लगा।

अब आई मगर की बारी। वह अपने साथी की हालत देखकर गुस्से से काँप रहा था। उसने ज़ोर से कहा- "कछुए, अब मैं तुझे मज़ा चखाकर रहूँगा। रस्सा ला।" "जी, समझा मगर भाई। पर इस बार आप नदी में रहेंगे और मैं ज़मीन पर। मंजूर है न?" कछुए ने कहा।

"हाँ-हाँ, मैं भी यही कहने वाला था। अब जल्दी रस्सा ला।" मगर ने कछुए से कहा।

कछुआ एक और मोटा रस्सा ले आया। एक छोर अपने पाँव में बाँधा और दूसरा मगर को दे दिया। मगर तुरंत अपना छोर पकड़कर धब से पानी में कूद गया। इस बार कछुए और मगर का दंगल देखने के लिए पानी वाले सारे जीव इकट्ठा हो गए। उघर हाथी इतने गुस्से में था कि चिंघाड़ते हुए ज़मीन वाले सभी जानवरों को वहाँ से भगा दिया और खुद भी वहाँ से चला गया।

कछुए ने देखा कि वहाँ कोई नहीं है तो उसने तुरंत रस्से को एक बड़े पेड़ के चारों ओर लपेट दिया। फिर कछुए ने जाकर ज़ोर से आवाज़ दी, "तैयार हूँ मगर भाई, खींचो।"

मगर पूरी ताकत लगाकर खींचता रहा, खींचता रहा पर कछुए को हिला नहीं सका। आख़िर में मगर ने बुरी तरह हार मान ली। इधर पानी के सभी जानवर मगर पर हँस रहे थे, "हा-हा, ही-ही, हैं-हैं।"

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संदर्भ: आदिवासी सृजन मिथक एवं अन्य लोककथाएं

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