संताली आदिवासी लोककथा:डायन विद्या का रहस्य
प्रस्तुति : अशोक सिंह
पुराने ज़माने की बात है। एक बार सृष्टि के रचयिता ठाकुर जी ने संताल पुरुयों को एक विद्या सिखाने के लिए दरबार में बुलाया। संताल महिलाओं को इसकी भनक लग गई। 'आखिर क्या बात है कि ठाकुर जी ने सिर्फ पुरुषों को ही विद्या सिखाने के लिए बुलाया है, हम महिलाओं को नहीं? अगर हम लोगों ने विद्या नहीं सीखी तो हम पिछड़ जाएँगी। महिलाओं ने सोचा।
फिर सबने मिलकर गुपचुप ढंग से कुछ सोच-विचार करने के बाद यह तय किया कि वे लोग यह विद्या ज़रूर सीखेंगी। फिर क्या था, महिलाओं ने पुरुष का वेश धारण किया और ठाकुर जी के दरबार में पुरुषों से पहले पहुंचकर वह विद्या सीख ली। उधर संताल पुरुषों को आपसी विचार-विमर्श करने में काफी देर लग गई। सभी पोचई पीकर मस्त हो गए। वे ठाकुर जी के दरबार में देर से पहुंचे।
"तुम लोग फिर आ गए? अभी-अभी तो तुम लोगों को मैंने आदमी को तंग करने की विद्या सिखाई। फिर क्यों वापस आए हो?" ठाकुर जी ने पूछा। ठाकुर जी की बात सुनकर सब आश्वर्य में पड़ गए।
"ठाकुर जी, हम लोग पहले तो नहीं आए। अभी-अभी आ ही रहे हैं।" उन लोगों ने कहा। तब ठाकुर जी और संताल पुरुषों को बात समझ में आ गई कि जरूर महिलाओं ने पुरुष का वेश बदलकर डायन-विद्या सीख ली है। यह जानकर सब चिंता में पड़ गए।
"कोई बात नहीं। जब महिलाओं ने हमसे छल कर डायन-विद्या सीख ही लो है, तो अब हम तुम लोगों को ओझा विद्या सिखाएँगे। ठाकुर जी ने पुरुषों को आश्वस्त किया।
"मगर ठाकुर जी, ये ओझा विद्या क्या होती है?" संताल पुरुषों ने पूछा। "ओझा विद्या का मतलब तुम लोग डायन महिला द्वारा पीड़ित आदमी का झाड़-फूंककर इलाज करोगे। ठाकुर जी ने उत्तर दिया। इस प्रकार ठाकुर जी ने संताल महिलाओं को डायन और पुरुषों को ओझा के रूप में प्रशिक्षित किया। तभी से महिलाएँ डायन और पुरुष ओझा बनकर अपना-अपना करतब दिखाने लगे।
संदर्भ
रमणिका गुप्ता-आदिवासी सृजन मिथक अन्य लोककथाएं
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