शनिवार, 22 जून 2024

संथाली आदिवासी लोककथा: सोने की थाली में बनी धरती

 


संथाली आदिवासी लोककथा: सोने की थाली में बनी धरती


प्रस्तुति : कृष्णचंद टुड्डू


"सतयुग की कथा है। जब मनुष्यों के पाप कर्म से बाबा ईश्वर क्रोधित हुए, तब उन्होंने एक हाथी बनाया। हाथी का नाम उन्होंने 'गजमती' रखा। वह आकाश से 'तोड़े तुताम' के सहारे धरती पर उतरा था। जैसे ही हाथी ने धरती पर पैर रखा, वैसे ही धरती जलमग्न हो गई और सारे जीव-जानवर, पेड़-पौधे डूब गए। धरती को जल में डूबते देखकर, 'जाहेर आयो', 'माराङ बुरू', 'लिटां', 'गोंसाय' आदि देवताओं ने आपस में बारह वर्ष तक विचार और तेरह वर्ष तक आचार किया था। तब वावा ईश्वर ने एक दिन बादलों के बीच में हंस की सृष्टि की।

जब वे प्रतिदिन की भांति 'कुश काराम' पत्तों में बैठकर नहा रहे थे, उसी समय बाबा ईश्वर ने 'सिरम' पेड़ की जड़ से दो पक्षी हंस-हंसिनी का निर्माण किया एवं उन्हें जीवन दिया। 'हंस-हंसिनी' जीवन मिलते ही आकाश में उड़ गए। बाबा ईश्वर की दया तथा आशीर्वाद से 'हंस-हंसिनी' ने 'करम' पेड़ पर घोंसला बनाया और घोंसले में दो अंडे दिए। अंडे से दो 'मानव' जन्मे। तब हंस-हंसिनी दिन-रात धरती के लिए क्रंदन करते रहते थे क्योंकि उस समय मानव के रहने के लिए धरती नहीं बनी थी। एक दिन बाबा ईश्वर ने धरती के निर्माण के लिए 'माराङ बुरू' को बुलाया। उनके आदेश से धरती बनाने के लिए 'माराङ बुरू' ने 'कछुआ राजा' को बुलाया।

बाबा ईश्वर ने कछुआ राजा से कहा, "कछुआ राजा, देखो मैं तुम्हारे शरीर पर धरती निर्माण करना चाहता हूँ, जिसके बदले मैं तुम्हें अपनी एक पुत्री तथा आधा राज्य दूँगा।"

बाबा ईश्वर की बात सुनकर कछुआ राजा ने 'हाँ' कर दी, तो उनके आदेशानुसार कछुआ राजा के चारों पैरों में 'सोनासिकड़ी' चारों दिशाओं-उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में बाँध दी गई। "हे ईश्वर, क्या मैं कभी भी नहीं हिल सकूँगा?" कछुआ राजा ने उनसे पूछा। "नाहीं, तुम बारह साल में केवल एक बार हिल सकोगे।" बाबा ईश्वर ने उत्तर दिया। बाबा ईश्वर के आदेशानुसार 'कारी नागिन' एवं 'नाग राजा' को भी बुलाया गया।

"नाग राजा, देखो मैं तुम्हारे शरीर पर धरती का निर्माण करना चाहता हूँ। इसके बदले में में तुम्हें अपनी एक पुत्री तथा आधा राज्य दूँगा।" बाबा ईश्वर ने नाग राजा से कहा।

बाबा ईश्वर की बात सुनकर नाग राजा ने भी 'हाँ' कर दी। फिर नाग राजा को कछुए की पीठ पर लपेटा गया और उसे भी बारह साल में एक बार कछुए के साथ हिलने के लिए कहा गया।

तत्पश्चात् माराङ बुरू ने नाग राजा के ऊपर सोने की थाली रखी। सोने की थाली के ऊपर मिट्टी उठाने के लिए 'चिंगड़ी मछली' को बुलाया गया और पाताल से मिट्टी उठाने के लिए कहा। परंतु चिंगड़ी मछली पाताल से मिट्टी नहीं ला सकी।

तब माराङ बुरू ने 'केकड़ा राजा' को बुलाया। केकड़ा राजा भी मिट्टी नहीं उठा सका। अंत में माराङ बुरू ने बाबा ईश्वर के आदेशानुसार 'लेंडेत (केंचुआ) राजा' को बुलाया। केंचुआ राजा ने पाताल में जाकर पाताल की मिट्टी लाकर सोने की थाली में रख दी और धरती बन गई। यह देखकर बाबा ईश्वर बहुत खुश हुए और अपनी एक पुत्री का केंचुआ राजा के साथ विवाह कर दिया तथा दानस्वरूप उन्हें अपना आधा राज्य भी प्रदान कर दिया।

धरती बन जाने पर बाबा ईश्वर के आदेशानुसार माराङ बुरू ने दुब्धी घास, सावड़ी घास, झाड़ियाँ और कँटीले पेड़-पौधों के बीज बोए। बीज से पेड़-पौधे उग गए। तब माराङ बुरू ने हंस-हंसिनी पक्षियों के अंडे से निकले दो मानवों को सागा-बुटा, जानुम-धुद अर्थात् हिहिड़ी-पिपड़ी में रखा। वहीं उनका नामकरण हुआ। पिलचू हाड़ा तथा पिलचू बुड़ही। पिलचू दंपती के सात पुत्र सोन्दरा, सान्दोम, चारे, माने, आचारे, देलहू, किरू तथा सात पुत्रियाँ छिता, कापरा, हिसी, डुमनी, दानगी, नासी हुई थीं। उनके ये वंशज ही आज के संताल हैं।"

निष्कर्ष: इस कथा में ईश्वर का प्रादुर्भाव हो गया है। दरअसल आदिवासियों में ईसाई धर्म को अपना लेने के कारण ही उनकी कथाओं में ईश्वर का आगमन हुआ। 'बाबा ईश्वर' जैसे शब्दों या संबोधनों का प्रयोग ईसाई प्रचारकों की देन है। पाप और उसका प्रायश्चित्त हिंदू प्रभाव से आया। आदिवासी अवधारणा में गलत सही की सोच ही प्रमुख है जो कबीले के नियमों को तोड़ने या न मानने से उपजती है किंतु पाप की अवधारणा उनमें नहीं है। हिंदू या अन्य धमों में पाप-पुण्य की धारणाएँ हैं। उनका भी कई क्षेत्रों में प्रभाव पड़ा है। हंस के अंडों से मानव की उत्पत्ति की अवधारणाएँ, 'बोडो' जनजाति में भी है किंतु कुछ भिन्न रूप से।

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जानकारी स्त्रोत: आदिवासी सृजन मिथक एवं अन्य लोककथाएं पुस्तक से

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