रविवार, 30 जून 2024

खड़िया आदिवासी समूह की 'गोत्र-कथा'-khadiya aadiwasi samuh ki gotra katha

 

खड़िया आदिवासी समूह की 'गोत्र-कथा'


प्रस्तुति : रोज केरकेट्टा

सेमो और डकई के नी बेटे और नी बेटियाँ हुई। उसकी गाय ने तीन बछियों को जन्म दिया, जिनका नाम सुरली, सुगनी और कपाली रखा। जब बेटे जवान हुए तो सेमो को बेटों की शादी की चिंता हुई। उसने पूरव-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण छान डाला पर बेटों के लिए पत्नी नहीं ढूँढ़ सका। उदास मन से सेमो घर लौट आया।

दूसरे दिन उसने अपने बेटों को यह हिदायत देकर शिकार पर भेजा कि नीचे चलने वाले जानवर को न मारें, केवल ऊपर वाले जानवर को ही मारें। सेमो के बेटे जंगल गए पर दोपहर तक उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। दोपहर होने को आई। इन लड़कों को प्यास लगी। तब धूप से बचने के लिए वे जाकर एक बड़े पेड़ के नीचे बैठ गए।

सबसे पहले सबसे बड़ा भाई पानी की खोज में निकला। बहुत दूर एक आँवले का पेड़ दिखाई दिया। बड़ा भाई वहाँ गया, तो उसने पाया कि चट्टान के बीच में पानी है और उसमें 'डुंगडुंग मछली' तैर रही है। बड़े भाई ने पानी पीकर प्यास बुझाई और आँवले की पत्ती तोड़कर उसे रास्ते में गिराते हुए, अन्य भाइयों के पास वापस गया।

तब उससे छोटा भाई आँवले की पत्तियों को देखते हुए पानी पीने गया। वहाँ उसे एक 'कुल्लु' (कछुआ) दिखाई दिया। तीसरा भाई पानी के पास गया, तो उसे वहाँ एक केरकेट्टा (केकड़ा) दिखाई दिया। इसी प्रकार चौथे को टिटहरी (टेटेटॉहॉइज) पक्षी, पाँचवें को टोः पोः पक्षी, छठे को बाघ, सातवें को बाज (बाअः), आठवें को पत्थर (सोरेंग) और नौवें को चट्टान पर नमक मिला।

सभी भाई सुस्ता चुके तो फिर से शिकार की खोज में चले गए। उसी समय उन्हें पहाड़ के ऊपर एक हिरण दौड़ता दिखाई दिया। हिरण ऊँचाई पर दौड़ रहा था, सो भाइयों ने उसका शिकार किया। सब ने अपने-अपने हिस्से का मांस 'पोटोम' पोटली) में बाँधा और घर वापस चले आए। घर पहुँचने पर इनकी नौ बहनों ने इनके पैर धोकर स्वागत किया। जब ये घर पहुँचे तो शाम हो चली थी।

"अपनी पोटलियाँ घर के पिछवाड़े टाँग दो, मैं तुम सबसे कल मिलूँगा।" पिता ने आदेश दिया।

दूसरे दिन प्रातः स्नान करने के बाद पिता ने सब बेटों को अपनी पोटली के साथ उपस्थित होने को कहा। बेटों ने ऐसा ही किया। जब पिता ने इनकी पोटलियाँ खोली, तो प्रत्येक की पोटली में वह था, जो उन्होंने पानी पीते वक़्त जलाशय में देखा था। जब पिता ने जानवर की खाल को फैलाकर देखा, तो उसमें सूर्य और चंद्रमा की छाप दिखी। पिता आनंद-विभोर हो उठे कि पोनोमोसोर ने उसके बेटों को गोत्र दे दिया है। अब वे भाई नहीं कुटुंब हो गए हैं। तब उसने अपनी नौ बेटियों की शादी अपने नौ बेटों से कर दी। अब वे नौ गोत्रों में बँट चुके थे।

विवाह में सबसे बड़े बेटे और सबसे छोटी बेटी की शादी हुई। इस तरह तब से खड़िया लोगों ने विवाह में व्यवस्था दी कि ज्येष्ठ पुत्र और ज्येष्ठ पुत्री की शादी नहीं होगी और दूसरा गोत्र बँट जाने के बाद सगोत्रीय विवाह नहीं होगा।

टिप्पणी : सृष्टि के आरंभ में सगोत्र विवाह की प्रया थी। बाद में ही सगोत्र विवाह का निषेध हुआ है। ज्येष्ठ पुत्र एवं ज्येष्ठ पुत्री की शादी का निषेध अन्य समाजों तथा अगड़ी जातियों में भी देखने को मिलता है।
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संदर्भ: रमणिका गुप्ता-आदिवासी सृजन मिथक अन्य लोककथा पृ 149-150

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