शनिवार, 29 जून 2024

आपातानी आदिवासी समुदाय की 'पानकथा'-aapatani aadiwasi samuday ki pankatha


आपातानी आदिवासी समुदाय की 'पानकथा'


प्रस्तुति : फिल्मिका

बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में दो दोस्त रहते थे, जो एक-दूसरे पर जान न्यौछावर करते थे। दोनों में से एक बहुत अमीर था और दूसरा बहुत ही गरीब। गरीव दोस्त अक्सर अमीर दोस्त के यहां जाता था और जब भी जाता उसकी बहुत अच्छी खातिरदारी की जाती थी।

एक दिन उसने अपने अमीर दोस्त से कहा- "दोस्त, मैं ही तुम्हारे घर आता रहता हूं पर तुम कभी मेरे घर नहीं आते।" अमीर दोस्त ने कहा- "हां दोस्त, मैं कभी तुम्हारे घर नहीं आया क्योंकि मैं हमेशा कामों में व्यस्त रहा, फिर भी इस सप्ताह मैं तुम्हारे घर अवश्य आऊंगा।"

कुछ दिनों बाद अमीर दोस्त अपने दोस्त के घर आया। अपने अमीर दोस्त को अपने छोटे से घर में देखकर वह फूला न समाया। उसने हृदय से उसका स्वागत किया। उसके घर में खाने को कुछ न था। इसलिए उसने धीरे से अपनी पत्नी के कानों में कहा- "जाओ, जाकर किसी दुकानदार से थोड़ा चावल और कुछ खाने का सामान उधार ले आओ ताकि हम अपने दोस्त की खातिरदारी कर सकें।"

उसकी पत्नी चली गई परंतु थोड़ी देर में खाली हाथ लौट आई। पत्नी को खाली हाथ देखकर उसका पति समझ गया कि उस जैसे गरीब को किसी ने उधार नहीं दिया। वह अपने भाग्य को कोसने लगा। वह सोचने लगा "जिस दोस्त के घर से मैं हमेशा खा-पीकर लौटता हूं, उस दोस्त को मैं कुछ न खिला सका।" वह स्वयं को धिक्कारने लगा। उसने सोचा कि उसके जैसे दुर्भाग्यशाली आदमी का इस दुनिया में जिंदा रहना व्यर्थ है। उसका मर जाना ही बेहतर है।" यह सोचकर उसने रसोई में रखी छुरी उठाई और अपने सीने में भोंक ली। जब उसकी पत्नी ने देखा कि उसके पति ने छुरी मारकर अपनी जान दे दी, तो उसने भी अपना जीवन अनावश्यक समझकर उसी छुरी से स्वयं को मार डाला।

घर आए दोस्त को जब लगा कि दोनों बहुत देर तक गायब हैं, तब वह उन्हें पुकारता हुआ उनकी रसोई घर में जा पहुंचा। वहां उसने देखा कि दोनों की लाशें पड़ी हुई हैं और घर के सारे बर्तन खाली हैं। ये नजारा देखकर उसे पूरी बात समझ में आ गईं। उसने सोचा- "मेरी खातिरदारी के लिए इनके पास कुछ न होने के कारण ही, शर्म से दोनों ने अपनी जान दे दी है। मेरे कारण दोनों की जान चली गई, इसलिए मेरा भी इस दुनिया में जिंदा रहना बेकार है।" अमीर दोस्त ने भी उसी छुरी से अपनी जान ले ली। इस प्रकार तीनों मर गए।

उसी रात एक चोर, चोरी के उद्देश्य से गांव में चारों ओर घूम रहा था और चोरी के लिए कोई सूनसान घर ढूंढ़ रहा था। वही घर उसे सूना-सा लगा। चोर उस घर में घुस गया और आग जलाई। आग की रोशनी में अपने सामने तीन-तीन लाशें पड़ी देख वह चौंक गया। वह सोच में पड़ गया 'न जाने इन लोगों के साथ क्या हुआ है? लगता है कि किसी लुटेरे ने इनकी हत्या कर इनका सारा धन लूट लिया।' यह सोचते-सोचते आग की गर्माहट के कारण उसकी आंख लग गई।

गांव में चहल-पहल से उसकी आंख खुली। वह झट से उठा लेकिन भागा नहीं। उसने सोचा- 'यदि मैं यहां से निकलूंगा तो लोग मुझे हत्यारा समझकर पकड़ लेंगे और सजा भी देंगे। समाज में बदनाम होने और लोगों द्वारा थूके जाने से तो अच्छा है कि मैं भी अपनी जान दे दूं।' चोर ने भी उसी छुरी को अपने पेट में मारकर अपनी जान दे दी।

इस प्रकार चार लोगों की जानें चली गईं। ऊपर बैठा यू ब्लेई ये सब देख रहा था। तब उसने कहा- "आदमियों को अपने दोस्त की खातिरदारी खाने-पीने की महंगी वस्तुओं से नहीं करनी चाहिए क्योंकि गरीब आदमी ऐसा नहीं कर सकते। इसलिए मैं दोस्तों की खातिरदारी के लिए ऐसी दूसरी वस्तु बनाऊंगा जो सस्ती और सुलभ हो।' इस प्रकार उसने अमीर दोस्त रूपी सुपारी, गरीब दोस्त रूपी पान का पत्ता और पत्नी रूपी चूना बनाया। इसलिए लोग सुपारी को पहले खाते हैं और पान और चूना पति-पत्नी के रूप होने के कारण साथ लगाकर खाते हैं। चोर रूपी तंबाकू को सबसे बाद में खाते हैं क्योंकि चोर सबसे अंत में आया था।

आज भी मेघालय में घर-घर में यह रिवाज है कि लोग घर आए मेहमान को चाय-नाश्ता न दे सकने पर, पान-सुपारी से उसका स्वागत और खातिरदारी करते हैं।


संदर्भ:
रमणिका गुप्ता: पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथाएं

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