असम के बोड़ो आदिवासी समुदाय की लोककथा:खेराई पूजा का आरंभ
प्रस्तुति : फुकन चंद्र वसुमतारी
अनुवाद : रमणिका गुप्ता
एक समय की बात है जारा फाग्ला नामक एक बूढ़ा था। लोग मजाक से उसे पगला कहते थे। उसके पांच सयाने बेटे थे। समय आने पर उन पांचों की शादी हो गई। इससे परिवार का आकार बहुत ज्यादा बढ़ गया और बूढ़े को परिवार चलाने में कठिनाई होने लगी। उसका संचित अन्न भंडार समाप्त हो गया। इसलिए एक दिन बूढ़े ने अपने बेटों से किसी उर्वर भूमि की खोजकर वहीं खेत बनाने को कहा। उसके बेटे पिता की आज्ञानुसार घर से दूर ऐसी जमीनें तलाश कर खेती करने लगे। बूढ़ा अपने मूल स्थान पर ही अपने परिवार और बहुओं की देखभाल में लगा रहा। बहुओं को वह बहुत मानता था, जैसा कि हर घर के बूढ़े बुजुर्ग करते हैं पर मोंगली नामक सबसे छोटी बहू के प्रति उसका विशेष स्नेह था (दूसरी कथा के अनुसार मोंगली सबसे बड़ी थडू थी)। माँगली न केवल अत्यधिक सुंदर थी बल्कि घरेलू कार्यों में दक्ष भी थी। यूढ़ा चाहता था कि मर्मोगली उसके सान्निध्य में रहे। वह क्या कर रही है, क्या खा रही है, वह सबका खूब ध्यान रखता। बूढ़े के इस अति स्निग्ध व्यवहार से मोंगली के मन में उसके इरादों को लेकर दुःशंका जन्मी। आखिर एक दिन भोर-भिनसरे वह घर से भाग निकली। बूढ़ा उसकी खोज में जगह-जगह की खाक छानता फिरा। उसे अपने आराम, भोजन, कपड़े लत्ते और स्वास्थ्य की भी सुध नहीं रही। लोग उसे पगला कहने लगे। कई दिनों बाद बूढ़े ने एक सपना देखा। सपने में एक बुजुर्ग से व्यक्ति ने उसे 'खाम' (ढोल), 'सेर्जा' (तारयुक्त वाद्ययंत्र), 'सिफुंग' (बांसुरी) और थाल, झांझ, मंजीरा बजा कर 'खेराइ' पूजा करने को कहा। बूढ़ा अपने पांचों पुत्रों के पास गया और पूर्णिमा की रात को विशाल धार्मिक पूजा आयोजित की। ढोल बाजे की आवाज के साथ ही एक स्त्री प्रकट हुई और दौदिनी के रूप में नृत्य करने लगी। यही स्त्री वस्तुतः मोंगली थी। 'खेराइ' पूजा की उत्पत्ति की कथा यही है। 'खेराइ' पूजा संपन्न करानेवाले बूढ़े का नाम मोनसिंग सिंग ब्राय था, जबकि सपने में आए बुजुर्ग का नाम बायी ब्राय था।
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