शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

मेघालय के खासी आदिवासी समूह की लोककथा: मोर के पंख सुंदर कैसे बने ?

 मेघालय के खासी आदिवासी समूह की लोककथा: मोर के पंख सुंदर कैसे बने ?


प्रस्तुति : विजोया सावियान

अनुवाद : अकील कैस

एक समय था जब मोर धूसर रंगवाला मामूली पक्षी था। तब उसकी पूंछ आज की ही तरह लंबी थी और चाल में इठलाहट और दंभ भी, पर उसमें सुंदरता लेशमात्र भी न थी।

कहते हैं कि एक दिन जंगल के सारे जानवर का स्नगी यानी सूर्य को अपना अभिवादन पहुंचाने के लिए एक दूत का चुनाव करने के लिए एकत्र हुए। का स्नगी अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थी। इस काम के लिए कई पक्षी उम्मीदवार बने। विचार-विमर्श के बाद मोर का चुना जाना तय हुआ। उसे अपनी शाही शानदार चाल और बड़े तथा मजबूत पंखों के कारण चुना गया। आखिर कुछ दिनों की तैयारी के बाद उसने अपने मित्रों से विदा ली और पखेरू पंख फैलाए आकाश में उड़ चला।

का स्नगी अपने विशाल साम्राज्य में अकेली रहती थी, इसलिए मोर के आने पर वह बहुत खुश हुई। उसने मोर के सत्कार में कोई कसर बाकी न रखी और शानदार ढंग से पूरे ऐशो-आराम के साथ उसे ठहराया। मोर ने भी अपने व्यवहार में उतनी ही शिष्टता और भद्रता दिखाई। शीघ्र ही उसने का स्नगी के दिल में अपनी जगह बना ली। वह उसका सबसे प्रिय पात्र बन गया।

कुछ समय तक सब कुछ भली-भांति चल रहा था कि एक दिन मोर ने महसूस किया कि प्रेमासक्त का स्नगी के लिए वह कितना महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य बन गया है। बस अहंकार उसके सिर पर चढ़ गया और वह स्वार्थी हो गया। का स्नगी उसकी फरमाइशें पूरी करने का हर संभव प्रयास करती। उसकी सनक-भरी अपेक्षाओं को संतुष्ट करती। मोर की किसी भी इच्छा को उसने अधूरा नहीं छोड़ा। मोर की सेवा में सन्नद्ध वह धीरे-धीरे शासन कार्य, अपनी प्रजा तथा उसके प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगी।

उघर नीचे पृथ्वी पर, क्या पशु और क्या मनुष्य सभी के सभी का स्नगी के छिटपुट दर्शन होने के कारण, उससे एकदम क्षुब्ध हो गए थे। बादलों भरे, बरसात के ठंडे दिन और उदास मौसम से जूझना पड़ता था उन्हें। चिड़ियों ने चहचहाना बंद कर दिया था। पेड़ों की पत्तियां अपना रंग खो बैठी थीं।

इस दुःखद स्थिति का कारण समझ आ जाने पर लोग एक बार फिर एकत्र हुए। वे मोर को पृथ्वी पर वापस बुलाने का उपाय देर तक सोचते रहे।

घंटों माथा-पच्ची करने के बाद भी उन्हें कोई समाधान नहीं सूझा। अंततः लोगों ने जंगल की सबसे ज्यादा उम्रदराज बुढ़िया से सलाह लेने का निश्चय किया। वृद्धा जंगल में लोगों के बीच 'बुद्धिमान वृद्धा' के नाम से जानी जाती थी।

लोगों की समस्या सुनकर कुछ देर तक बुद्धिमान वृद्धा मुंह चलाती रही। फिर बोली, "मेरे दोस्तो, यदि आप चाहते हैं कि मैं आपकी समस्या का हल बताऊं तो आपसे दो अनुरोध हैं। ध्यान से सुनिए। पहली बात यह कि आप जंगल में कटाई कर एक बड़ा खंड साफ करें ताकि मैं वहां सरसों के बीज लगा सकूं। दूसरी बात, सभी को समझा दें कि न तो कोई पक्षी वहां से एक भी दाना चुगेगा और न कोई पशु उन पर चढ़ेगा।"

सरसों के खेत की देखभाल में बुद्धिमान वृद्धा व्यस्त हो गई और इस तरह कई महीने बीत गए। लोग अचंभे में थे कि आखिर बुद्धिमान बुढ़िया की युक्ति है क्या? वह लगातार कई घंटों तक खेतों से घास-फूस की सफाई-सुथराई में जुटी रहती। आखिर सरसों के पौधे उग आए। उसने सरसों के खेतों को वृत्ताकर शक्ल दी थी। अपनी उत्सुकता के बावजूद बुद्धिमान वृद्धा से पूछने का साहस कोई भी न करता कि आखिर वह कर क्या रही है। यह बुढ़िया अपने मितभावी स्वभाव और प्रचंड कोच के लिए प्रसिद्ध थी। अंततः वे दिन भी आए कि सरसों फूलने लगी।

मोर के दिन तो आसमान में ऐशो-आराम के कट रहे थे पर का स्नगी के प्रेमातिरेक से यह कुछ ऊबने लगा था। एक सुबह महल के फाटक के बाहर टहलते हुए उसकी नजर पृथ्वी पर पड़ी, तो उसने जंगल के बीच स्थित एक अत्यंत आकर्षक दृश्य देखा। इतना सुंदर दृश्य उसने तब तक जीवन में देखा ही न था। चमकदार सोने के वस्त्र पहने वहां एक सुंदर कन्या लेटी थी। उसने तुरंत उस सुंदरी से मिलने और उसे अपने वश में करने का निश्चय किया।

जब का स्नगी ने मोर के नए प्रेम और उसके वहां से चले जाने के बारे में

सुना, तो उसका दिल टूट गया।

"मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ।" उसने मोर से अनुरोध किया। "में फिर एकाकी जीवन बिताना नहीं चाहती।"

मगर मोर के कान पर जूं न रेंगी। उसने उपेक्षापूर्वक उसे अलविदा कहा और पृथ्वी की ओर अपनी वापसी का सफर शुरू कर दिया।

का स्नगी काफी समय तक, उसका पीछा करती रही। यह पूरे समय रोती रही। जैसे-जैसे उसके आंसू मोर के शरीर पर गिरते थे, वहां चटखदार रंग बिखेर देते। मोर के धूसर पंख इतने सुंदर हो गए कि किसी ने ऐसे पंख कभी देखे ही न थे।

मोर जब पृथ्वी पर लौटा तो उसकी सुंदर छवि देख सभी चकित रह गए। यह सोचकर कि अब का स्नगी पुनः राजकाज में जुट जाएगी, वे खुश हो गए। पर मोर यह देख कुपित हो गया कि यह सुंदर लेटी हुई कन्या कुशलता से बनाया गया सरसों का खेत था। लेकिन अब उसके वश में था भी क्या? वह अब इतना मोटा और भारी हो गया था कि पुनः आकाश में उड़कर जाना उसके लिए संभव न था।

प्रत्येक सुबह आज भी जब वह अपने खोए हुए का स्नगी के प्यार को अपने सामने आते देखता है, तो वह हमेशा की तरह अपने पंख फड़फड़ाकर फैला देता है और उसे सलाम करता है। आखिर का स्नगी के आंसुओं की बूंदों से रंजित उसके भव्य व मनोहर पंख उसके प्रेम की निशानी जो हैं!

संदर्भ

रमणिका गुप्ता-पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथाएं पृ 156-158


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