रविवार, 30 जून 2024

नागालैंड के आदिवासी समूह की लोककथा: लिजाबा ने सिरजी नागा धरती-nagaland ka jangali aadiwasi samuh ki lokakatha lihaja ne sitaji naga dharati

 


नागालैंड के आदिवासी समूह की लोककथा: लिजाबा ने सिरजी नागा धरती


दीपेन्द्र की प्रस्तुति

अनुवाद: रमणिका गुण

(ये मिथक मूलरूप से 'ओ' नागा जनजाति की कविता में गाई जानेवाली लोक (ये मिधारित हैं। ये जनजाति ब्रह्मपुत्र के उर्वरा मैदानों के पास बसती है। इसे अपन वैसी भी कहा जाता है, जिसे बाद में अहोम या असमी भी कहा जाने लगा। इन्हें बाहलैंड से आकर मध्य युग में इस घाटी पर कब्जा जमा लिया था। इस धरती के पास एक क्षेत्र है, जो बफर जोन की तरह काम करता है, जिसका अभी तक सीमांकन नहीं हुआ और न ही यह तय हुआ कि यह भूमि किस राज्य में है। उत्तर-पूर्व के दक्षिण-पश्चिम तक फैला हुआ असम और नागालैंड तक फैला हुआ यह इलाका लगभग 10 से 20 बीस किलोमीटर तक चौड़ा है। पहाड़ी क्षेत्र जो नागालैंड से शुरु होता है, मयांमार की घाटी चिंदविन दरिया तक फैला है और यह क्षेत्र और खड़ा व घाटियों ये ऊंचे-नीचे पहाड़ों, पतली नदियों और गहरी खाइयों व खंदको (Gorges) से पटा है। यह मूलरूप में कविता में लिखा हुआ है। हम इसे गथ में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह एक नागा-कथा है, जिसे श्री टी पेन्जू ने पढ़ा।)

मैं सुधिजन पाठकों के निमित्त सुनाता हूं नागा देश के सृजन की 'नागा औ गाया। नागाओं का यह विश्वास है कि 'लिजाबा' ने नागा देश की धरती को बनाया।

सृष्टि-सृजक लिजावा ने जब पृथ्वी का सृजन शुरू किया तो वह पश्चिम से पूर्व तक सतत् धरती का सृजन करता ही चला गया। वह दिन-भर काम करता और रात को विश्राम ! कभी नहीं थकता था वह। एक दिन एक अत्यंत ही उर्वर घाटी तैयार हो गई।

उस धरती को देख लिजावा अत्यंत ही उल्लास से भर गया! फिर क्या था। बत, कुछ दिनों के लिए उसने छु‌ट्टी ले ली और खूब आराम किया। अवकाश के बाद जब लिजाबा लौटा तो वह पूरब की तरफ धरती बनाने चल दिया।

पूर्व दिशा की ओर काम करना शुरू किया ही था कि उसके पास एक बहुत बड़ा कॉकरोच आ पहुंचा। कॉकरोच ने उसे बताया- "आगे खतरा है, सावधान हो जाओ! तुम्हारे सृजन में बाधा पड़ सकती है।" कॉकरोच पर खतरे का डर इतना हावी था कि उसे देखकर लिजावा भी सहम गया। उसका सृष्टि सृजन का सारा उत्साह कुछ ठंडा पड़ गया। उसका ध्यान बंट गया। इसलिए उसने हड़बड़ाकर बाकी की घरती जल्दी-जल्दी बना डाली।

'औ नागा' लोगों की ऐसी धारणा है कि असम और नागालैंड के बीच जो धरती चट्टानों से भरी, दलदली और ऊंची-नीची है, वहीं पर कॉकरोच आकर रुका था, जिस कारण वह धरती ऊबड़-खाबड़ और ऊजड़ हो गई।

वह जमीन ठोस नहीं बन पाई थी और कभी भी धंस सकती थी। नागा लोग ऐसा मानते हैं कि यह वही धरती है जिसे लिजाबा ने हड़बड़ी में बनाया था। वहीं से पहाड़ों, ढलानों तथा शिखरों का सिलसिला शुरू हो जाता है।

असम और नागालैंड के बीच में बहुत बड़ी और गहरी बंजर ढलानें हैं, जिन पर कुछ नहीं उगता। वे जगह-जगह से टूटी-फूटी तो हैं ही, वे हर बरस धंस भी जाती हैं, जिससे पहाड़ों के किनारे-किनारे बड़ी-बड़ी चट्टानें और पत्थरों के टुकड़े गिर जाते हैं।

नागा लोग अपनी भौगोलिक आकृति के बारे में यह धारणा पालते हैं कि कॉकरोच के डर और लिजाबा की हड़बड़ी के कारण ही नागा देश में पहाड़ियां-ही-पहाड़ियां हैं, जबकि असम और भारत में घाटियां हैं।

असम घाटी के खत्म होते ही पूर्व की तरफ पूरा-का-पूरा पहाड़ी क्षेत्र है, जिसमें पतली लीक-सी दिखनेवाली नदियां, अत्यंत गहरी घाटियों और खंदकों में बहती हैं। लगता है यह वही स्थान है जहां, संभवतः सृष्टा ने अपना सारा गुस्सा उतारा। नागा पर्वत के शिखर से चढ़कर देखने पर बादलों से ढकी पहाड़ियां ऐसी दिखती हैं, जैसे कि परदे लटके हों।

पूर्व की तरफ बहुत धारदार चोटियां हैं। यह लिजिन्द्री और भूगोल का संगम जान पड़ता है। लोककथा और भौगोलिक नक्श, दोनों आपस में एकमएक होकर मिल गए लगते हैं। हमारा मानना है कि नागा के पूर्वजों को लिजिबा के इस सृजन कार्य का थोड़ा-थोड़ा आभास पहले से ही हो गया था।

संदर्भ: 
रमणिका गुप्ता-आदिवासी पूर्वोत्तर सृजन मिथक एवं लोककथाएं पृ 40-41

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