सोमवार, 1 जुलाई 2024

खड़िया आदिवासी लोककथा : बाघ और बन्दर-khadiya aadiwasi lokkatha: bagh aur bandar

 


खड़िया आदिवासी लोककथा : बाघ और बन्दर


एक आदमी ने एक बन्दर पाला था। उस आदमी का नाम था धुन्धा। युन्चे ने उस बन्दर का नाम चामू रखा था। धुन्चा जिधर काम करने जाता था तो साथ मैं चामू को भी लेता जाता था। जिस समय शिकार खेलने जाते थे तो बन्दर कुत्ते के ऊपर चढ़ जाता था. मान लिया कुत्ता उसका घोड़ा था। जब वे गिलहरी पाते थे, तो बिना मारे नहीं लौटते थे (नहीं छोड़ते थे)। यदि गिलहरी वृक्ष पर चढ़ जाता था तो बन्दर भी चढ़ता और दौड़ता था। नीचे उतरता था तो आदमी और कुत्ता। कोटर में घुसता था तो बन्दर भी घुसता था। और निकालता था। ऐसा में उसको शिकार खेलने का शौक था।

एक बार धुन्धा और चामू आषाढ़ महीने में गुंगु की पत्ती तोड़ने के लिए वन गए। गुंगु की लता खूब घनी थी। उस झाड़ी में एक बाघ रहता था। वह नहीं जानता था कि यहाँ बाघ है। बन्दर है तो बन्दर ही, वह एक स्थान में नहीं रहता है। वह इधर-उधर दौड़ने लगा, इस शाखा से उस शाखा में उछलता था। उसी समय उसने बाघ को देखा। बाघ आदमी को खाने के लिए दुबकते हुए आदमी की ओर जाने लगा था। ऐसे समय में बन्दर का कार्य देख लें। उसने अपने मालिक को बचाने के लिए क्या किया? उसका मालिक पत्ती तोड़कर एक पोटली बना रहा था। वह एक पत्थर पर बैठा था। उसका मालिक बाघ के बारे में अनजान था। बन्दर ने झट अपने मालिक को छिपा लिया और अपने मालिक के स्थान पर वह काम करने लगा। बाघ आया और बन्दर से पूछता है कि बड़े भैया, चामू, क्या बनाने में लगे हो? बन्दर बोला- ढाढू कहीं के (मति मूर्ख) आज तक तुम अनजान हो। देखोगे आग बरसनेवाली है। इसी आग की वर्षा से बचने के लिए पोटली बना रहा हूँ। मैं इस पोटली में घुस जाऊँगा और अग्नि-वर्षा से बच जाऊँगा।' इस बात को सुनकर बाघ डर गया और बन्दर से बोला, 'भैया चामू, मेरे लिए पहले पोटली बना दो। मैं तो बड़ा हूँ, इसलिए मेरे लिए पहले एक बड़ी पोटली बनाओ बाद मे अपने लिए बनाना।' बन्दर ने इस बात को पसंद किया। बन्दर ने बाघ के समाने जैसा एक पोटली बनायी। वाघ घुस गया और बन्दर ने पोटली को अपने मालिक की सहायता से बाँध दिया। उन्होंने उसे एक वृक्ष के नीचे ले लिया और एक डाल पर लटका दिया। नीचे उन्होंने बड़ी-बड़ी लकड़ियों को जमा किया और आग मुलगा दी। जिस समय वाघ जलने लगा तब वह जोर से रोने लगा। बन्दर ने उसे डॉटकर कहा, चुप रहो मूर्ख, मुझे भी तो लग रहा है, मैं तो नहीं रो रहा हूँ। जैसे-जैसे आग की आँच बढ़ती जाती थी, वैसे बाघ और अधिक चिल्लाने लगा। बन्दर ने और ठूंठ लकड़ी जमा कर दी तथा बाघ का तमाशा देखने लगा। अंत में बाघ का बँधा हुआ रस्सा जल कर गिर गया और बाघ आग में जलकर राख हो गया। बन्दर अपने मालिक को दुःख से बचाया। इसी तरह जन्तु भी कभी-कभी अच्छा कार्य करते हैं।
संदर्भ:
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख जनजातीय लोककथाएं

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