हो आदिवासी समुदाय की लोककथा:वीर चेंडेया
बहुत दिन हुए चेंडेया नामक एक चरवाहा रहता था। घने वन में उसकी एक झोंपड़ी थी। वह वन में बकरियों को चराता और अपनी छोटी-सी झोपड़ी में बकरियों के साथ रहता था। वन के कंद-मूल-फल और बकरियों का दूध ही उसका भोजन था। वह सुबह-सुबह बकरियों को लेकर जंगल में निकलजाता और संध्या समय घर वापस लौटता।
एक दिन राजा का पागल हाथी घूमता हुआ चेंडेया की झोपड़ी के पास आ पहुँचा। चेंडेया घर में नहीं था। वह तो सुबह से ही वन में बकरियाँ चरा रहा था। हाथी ने उसकी झोपड़ी तहस-नहस कर डाला और झूमता हुआ लौट गया।
संध्या समय अब वह वापस आया तो अपनी झोपड़ी को नष्ट पाकर बहुत दुःखी हुआ। परंतु उसने उसे फिर बना लिया।
दूसरे दिन फिर सुबह वह अपनी बकरियों को लेकर वन में चला गया। राजा का पागल हाथी फिर आया और उसकी झोपड़ी तहस-नहस कर डाला। संध्या समय वापस आने पर वह दुःखी हुआ। तीसरे दिन वह जंगल नहीं गया राजा का पागल हाथी फिर आया और उसकी झोपड़ी तहस-नहस करने लगा।
चेंडेया ने गरज कर हाथी को रोका और डॉटकर बोला, "बदमाश! तुमको मैं दो दिनों से देख रहा हूँ। क्या तुम मेरी शक्ति को नहीं जानते, मैं तुम्हारी सूँड़
पकड़ कर इस तरह फेंकूंगा कि तुम सात समुद्र पार दलदल में जा गिरोगे।" हाथी यह सुनकर बहुत डर गया। डर के कारण उसका पागलपन भी छूट गया। महल में आने पर उसने खाना-पीना सब छोड़ दिया।
राजा उसको बहुत प्यार करता था। उसकी ऐसी हालत देखकर राजा ने इसके कारण का पता लगाया। अन्त में सही बात का पता लग जाने के बाद चेंडेया राजा के पास लाया गया। चेंडेया ने सारी बात कह सुनायी। परंतु राजा बहुत नाराज हुआ और क्रोध में आकर बोला, "यदि तुम इसे (हाथी को) सात समुद्र पार नहीं फेंकोगे तो तुम्हें कुत्तों से नुचवाऊँगा। यदि फेंक दोगे तो तुम्हें आधा राज्य और अपनी बेटी दे दूँगा।"
चेंडेया ने शर्त मान ली। दूसरे दिन एक बहुत बड़ी भीड़ जमा हो गयी। एक बड़े मैदान में हाथी को लाया गया। चेंडेया शान के साथ आगे बढ़ा। उसने हाथी की पूंछ पकड़ी और ऐसी फेंका की किसी को अता-पता भी नहीं चला कि हाथी कहाँ गिरा।
सभी लोग चेंडेया की वाहवाही करने लगे। परंतु राजा बहुत चिन्तित हो गया कि वह एक चरवाहा से अपनी बेटी की शादी कैसे करे। अतः उसने बहाना बनाया कि चेंडेया उस हाथी को फिर यहाँ ला दे तो उसे शर्त की सारी चीजें मिल जायेंगी।
चेंडेया भी हार मानने वाला नहीं था। वह हाथी की खोज में चल पड़ा। रास्ते में उसे एक बलवान् आदमी मिला। वह लोहे के हल से चट्टान को जोत रहा था। चेंडेया बहुत खुश हुआ और उसकी खूब प्रशंसा की। पर उसने कहा कि चेंडेया के आगे तो वह तिनका भर भी नहीं है। चेंडेया बहुत खुश हुआ और असली परिचय दिया। चेंडेया ने उसे अपने साथ कर लिया और दोनों सात समुद्र पार दलदल की खोज में चल पड़े।
रास्ते में उन्हें एक और आदमी मिला। वह सात बैलगाड़ियों में लकड़ी भर कर उन्हें अपने हाथों से खींच रहा था। चेंडेया उसे देखकर बहुत खुश हुआ उसकी बहुत प्रशंसा की। परंतु उस आदमी ने कहा कि वह तो कुछ भी नहीं है। सबसे बड़ा वीर तो चेंडेया है। चेंडेया ने कहा, "मैं ही वह व्यक्ति हूँ।" यह सुनकर वह बहुत खुश हुआ और वह भी उन दोनों के साथ चल पड़ा।
बहुत दिनों तक चलने के बाद तीनों सात समुद्र पार दलदल में जा पहुँचे। तीनों ने मिलकर हाथी को दलदल से निकाला। चेंडेया दोनों को अपनी जगह छोड़कर हाथी के साथ राजदरवार में आ पहुँचा।
राजा ने चेंडेया के साथ हाथी को देखकर हार मान ली। उसने अपना आधा राज्य चेंडेया को दे दिया और अपनी पुत्री की शादी भी उसके साथ कर दी। चेंडेया जब राजा हुआ तो अपने दोनों साथियों को मंत्री और सेनापति बनाया। कुछ दिनों के बाद राजा बूढ़ा हो गया। उसे कोई लड़का नहीं था। अतएव उसने अपना सारा राज्य चेंडेया को ही दे दिया और खुद साधु बन गया।
चेंडेया बहुत शक्तिशाली राजा हुआ। उसने बहुत-से देश जीते और शान्तिपूर्वक राज करने लगा।
संदर्भ
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख जनजातीय लोककथा पृ 38-40
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