बुधवार, 26 जून 2024

कुड़ुख आदिवासी लोककथा :नीलगाय के बच्चे-Kudukh Aadiwasi Lokakatha: Nilgay Ke Bacche

 


कुड़ुख आदिवासी लोककथा :नीलगाय के बच्चे


प्रस्तुति : कृष्णचंद टुड्डू

पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी का विवाह हुआ। विवाह होने के बाद वे दोनों चायगढ़ और चम्पागढ़ जैसे गढ़ों में रहने लगे। उनका जीवन सुखी था। इनकी बारह संतानें पैदा हुई, जिनमें लड़के और लड़कियाँ दोनों शामिल थे। सबसे बड़ी लड़की का नाम 'हिसी' था।
बच्चों को पालते हुए वे दोनों पति-पत्नी नदी के किनारे खेती-बारी करने लगे। वे 'इड़ी" 'गोंदली' व 'एरबा" अनाज की फसलें उगाने लगे। बड़ी लड़की हिसी भी खेती-बारी में उनका हाथ बँटाने लगी।
फसल होने पर हर रोज़ एक 'मुरूग' (नीलगाय) अपने बच्चों के साथ उनके खेत में इड़ी व एरबा अनाज खाने आने लगी थी। पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी इससे दुखी व परेशान हो गए थे। उन्होंने जंगली नीलगाय को खेत में न आने देने के लिए एक तरकीब सोची। अगले दिन उन्होंने नीलगाय के खेत में आने के रास्ते में 'सुलाख खूँटी' (कँटीली लकड़ी) गाड़ दी।
जब जंगली नीलगाय आई और सुलाख खूँटी को लाँघकर पार करने लगी, तो खूँटी उसके पेट में घुस गई। वह छटपटाने लगी और दौड़कर सीता नाला और सालगाड़िया (डोभा) का पानी पीने लगी। पानी पीकर वह सहारबेड़ा (नदी के किनारे मैदानी क्षेत्र) के पास पहुँची ही थी कि मर गई। नीलगाय के बच्चे ने सीता नाला और सालगाड़िया तक तो उसका पीछा किया लेकिन तेज़ी से न दौड़ पाने के कारण वह अपनी माँ से बिछुड़ गया। 
माराङ बुरू को नीलगाय के बच्चे पर दया आ गई। उन्होंने अपनी शक्ति से नीलगाय के बच्चे को आदमी बना दिया। तभी से वह आदमी के रूप में रहने लगा। इधर पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी के बच्चे नीलगाय को खोजने लगे। खोजते-खोजते वे 'सहारबेड़ा' पहुँचे। उस समय पिलचू हड़ाम एवं पिलचू बूढ़ी सहारबेड़ा जंगल में पत्ते तोड़ने गए थे। वहीं आदमी के रूप में रह रहा नीलगाय का बच्चा उन्हें मिला। वह सालगाड़िया में मछली और केकड़े पकड़ रहा था।
पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी के बच्चे 'सारजोम' (सखुआ) पेड़ के नीचे मरी हुई गाय को काट रहे थे। सब लोग वहीं इकट्ठे हो गए। आदमी का जीवन जी रहा नीलगाय का बच्चा एक पत्थर पर बैठ गया। बाकी लोगों से उसकी मित्रता हो गई, उसके द्वारा पकड़े मछली और केकड़े भी पकाए गए, जिन्हें बाद में सभी एक साथ मिलकर खाने लगे।
जब पिलचू हड़ाम, पिलचू बूढ़ी व उनके बच्चे नीलगाय का मांस खा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि नीलगाय का बच्चा चुन-चुनकर मछली एवं केकड़ा खा रहा है और नीलगाय के मांस को छोड़ दे रहा है।
यह देखकर पिलचू हड़ाम ने कहा, "यह बच्चा निश्चित तौर पर नीलगाय का बच्चा है। इसलिए इसे 'मुरमू' का गोत्र ही दिया जाए।"
उसके बाद पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी ने 'पेटेरबाड़े' (बरगद) पेड़ के नीचे बैठकर गोत्रों का विभाजन किया। बारह बच्चों के हाथ में बारह तरह के जीव-जंतु व चीजें पाई गईं। उन्हीं के आधार पर बारह गोत्रों का नामकरण हुआ।
'हास' चिड़िया से 'हासदाः', 'मारडी' घास (एक विशेष प्रकार की घास का नाम, जो धान जैसी लगती है और उसी के साथ उगती है) से 'मारडी', लाठी से 'सोरेन', 'गुआ' (सुपारी) से हेम्ब्रम, 'टुःटुकुर' चिड़िया से 'टुडू', 'किकिर' चिड़िया से 'किस्कू', बासी भात से 'बास्के' आदि गोत्रों का नामकरण हुआ।
विशेष संज्ञा:
1. इड़ी-एक प्रकार का मकई जैसा अनाज।
2. गोंदली-एक प्रकार का अनाज जो छोटे-छोटे दाने वाला होता है।
3. एरवा-एक प्रकार का बाजरे जैसा अनाज ।

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संदर्भ:
रमणिका गुप्ता- आदिवासी सृजन मिथक एवं अन्य लोककथाएं

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