रविवार, 23 जून 2024

झारखंड के 'हो' आदिवासी समुदाय की 'धरती बनने की लोककथा'



झारखंड के 'हो' आदिवासी समुदाय की 'धरती बनने की लोककथा'

प्रस्तावना: 
आदिवासी बहुत राज्य झारखंड में अनेक आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। इन्हीं समुदायों में से हो समुदाय है। यह समुदाय मुंडा आदिवासी समूह का उप समूह है। झारखंड के सिहभूम जिले तथा ओड़िसा राज्य के मयुरभंज जाजपुर जिलों में इस समुदाय की आबादी अधिसंख्य मात्रा में मिलती है। हो आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक विशेषता भी रही है। इसमें उनकी लोककथाएं काफ़ी प्रचलति रही है। तो चलिए हम इस पोस्ट के माध्यम से उनकी 'धरती बनने की लोककथा' का विश्लेषण करेंगे

हो समुदाय की धरती बनने की लोककथा:
 
विश्व की सृष्टि के पूर्व जंगल, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि नहीं थे। केवल पानी-ही-पानी था। ईश्वर (सिंगबोंगा) ने विचार किया, "यह पानी कैसे हटे और धरती का कैसे निर्माण हो।"

उन्होंने सर्वप्रथम एक कछुए का सृजन किया। वह पानी के भीतर घुसा और नीचे से मिट्टी लाकर डालना शुरू किया। वह बार-बार मिट्टी को पानी के ऊपर लाकर छोड़ देता। परंतु इससे मिट्टी एकत्र नहीं हो सकी और धरती का निर्माण नहीं हो सका।

ईश्वर ने सोचा, "कौन मिट्टी को भीतर से लाकर इस प्रकार जमा कर सकता है कि धरती बन जाय।" कछुआ बोला, "मैं अकेला हूँ और एक हाथ से मिट्टी लाता हूँ। एक बड़ा हाथ दें तो पूरी (अधिक) मिट्टी ले आऊँगा।"

तब ईश्वर ने एक केकड़ा बनाया जिसको पाँच हाथ दिये। केकड़ा पानी के भीतर चला गया और मिट्टी लाने लगा। वह मिट्टी पूरी-की-पूरी ले आता था। परंतु मिट्टी पानी में घुल जाती थी। इस प्रकार केकड़ा से भी धरती का निर्माण नहीं हो सका।

तब ईश्वर ने पुनः विचार किया, "मिट्टी ऊपर तक कैसे आयेगी, पानी भरा हुआ है" ईश्वर ने जाँघ से मैल छुड़ाकर दो "चेरा" पैदा किया और एक को स्त्री तथा दूसरे को पुरुष बनाया। दोनों चेरों को पानी में छोड़ दिया। इन दोनों ने मिलकर कुछ भी काम नहीं किया। उस पर ईश्वर सोचने लगे, "इन चेरों ने मिलकर कुछ भी काम नहीं किया। ये मिट्टी नहीं लाये और बिना काम किये रह गये।" लेकिन चेरों ने पानी के भीतर मिट्टी खा-खाकर उस मिट्टी से पहाड़ बनाना शुरू कर दिया था। इस तरह ऊपर से नहीं, नीचे से ही मिट्टी निकालना शुरू किया। इसकी जानकारी इन्होंने सिंगबोंगा (ईश्वर) को नहीं दी। इन चेरों से और बच्चे हुए और सबने मिलकर धरती बनाने का काम शुरू किया। इस प्रकार कालक्रम से मिट्टी पानी के बाहर आ गयी। धीरे-धीरे मिट्टी पानी के ऊपर आती गयी और पानी भीतर-भीतर सूखता गया। थोड़ी-थोड़ी मिट्टी बनते-बनते कुछ समय बाद मिट्टी का पर्वत बन गया। कुछ दिनों के बाद यह मिट्टी जमकर (सूखकर) कड़ी हो गयी और इस प्रकार धरती का निर्माण हो गया। जहाँ कहीं गड्ढ़ा रह गया, वह समुद्र बन गया।

अभी भी चेरा सिड्बोंगा के आदेशानुसार मिट्टी से पहाड़ बनाता रहता है। कछुआ और केकड़ा अब पानी में या किनारे पर रहते हैं।

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जानकारी स्त्रोत: डॉ. आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख जनजातीय लोककथा 

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