मंगलवार, 25 जून 2024

'हो' आदिवासी लोककथा: पेड़-पौधे और जीवधारियों का सृजन-'Ho' Aadiwasi Lokakatha: Ped-Poudhe Aur Jivdhariyon Ka Srujan


 'हो' आदिवासी लोककथा: पेड़-पौधे और जीवधारियों का सृजन

जब धरती का निर्माण हो गया और कहीं-कहीं पानी भी शेष रह गया, लेकिन धरती पर इनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था, केवल खाली और ऊबड़-खाबड़ धरती थी। तब सिंगबोंगा (ईश्वर) ने विचार किया कि यह धरती किस प्रकार अच्छी होगी। उन्होंने चेरा, कछुए और केकड़े को बुलाया। उन्होंने विचार किया कि धरती कहीं ऊँची और कहीं नीची है, यह एक तरह से समतल नहीं है। सिंगबोंगा ने सोचा कि उन्हें (चेरा, कछुआ और केकड़ा) हाथ और पैर नहीं है। ये धरती को समतल कैसे करेंगे।

तब सिंगबोंगा ने हाथ-पैर (दो हाथ दो पैर) देकर "सुरमि-दुरमि" का सृजन किया। इन्होंने थोड़े दिनों में ही धरती को समतल कर दिया। तब वे सिंगबोंगा से बोले, "हमने धरती को समतल कर अपना काम खत्म कर दिया।" सिंगबोंगा बोल, "अच्छा तुमलोगों को मदद करने के लिये बाघ, भालू, बनैला भैंसा, हिरन, हाथी आदि का सृजन करता हूँ, जिन्हें जोतकर धरती को तुमलोग उपजाऊ बना लोगे।" इस प्रकार सिंगबोंगा ने इन जीवों को बनाया। सुरमि-दुरमि ने इन्हें जोतकर धरती को खेत बनाया और इस पर पेड़-पौधों को रोप दिया। इस प्रकार पहाड़ बन गया और समतल जमीन खेत बन गया।"

ऐसी किंवदन्ती है कि सुरमि-दुरमि ने कई पोखरे भी बनाये थे। पहाड़ियों पर या पहाड़ियों से घिरे अभी भी ऐसे पोखरे हैं। ऐसा विश्वास है कि पहाड़ियों से घिरे अभी भी ऐसे पोखरे के आसपास बड़े-बड़े देवी या देवता रहते हैं। कहीं-कहीं असुर भी रहे हैं। आज भी ओझा-गुनि लोग असुर देवता और सुरमि-दुरमि की पूजा करते हैं और "हो" समाज में ये दुष्ट प्रेतात्मा की तरह माने जाते हैं।

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जानकारी स्त्रोत: डॉ आदित्य प्रसाद सिंह-झारखंड की जनजातीय लोककथा

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