सोमवार, 24 जून 2024

मुंडा आदिवासी समुदाय की लोककथा: सोहराई पर्व-Munda Aadiwasi Samuday Ki Lokakatha: Soharay Parv


 

मुंडा आदिवासी समुदाय की लोककथा: सोहराई पर्व

प्रस्तावना:

भारत के झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे राज्यों में सोहराई पर्व आदिवासी समुदाय मनाता है। यह पर्व अक्टूबर नवंबर में अमावस्या के दिन मनाया जाता है। नई फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व है।साथ ही गाय, भैस, बकरी और मवेशियों के सम्मान के लिए भी यह पर्व मनाया जाता है। तो हम इस पोस्ट के माध्यम से सोहराई पर्व की मुंडा समूह की लोककथा का विश्लेषण करने वाले हैं। 

सोहराई पर्व की लोककथा

एक आदमी एक दिन नदी की ओर गया था। उसने कुछ बछड़ों को देखा। उनके सारे शरीर में धूल और कीचड़ लगा हुआ था। आदमी ने उन्हें पानी से धोकर साफ किया। बछड़ों ने कहा कि अब तुम जल्दी से यहाँ से भाग जाओ। नहीं तो अब हमारी मायें आयेंगी तो तुम्हें मार डालेगी। आदमी ने कहा कि मैं तुम्हारी माताओं को देखना चाहता हूँ। वह एक पेड़ पर चढ़कर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद जब गायें आई तो अपने बछड़ों को साफ-सुथरा देखकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने बछड़े से पूछा, तुम्हें इतना साफ-सुथरा किसने बनाया? बछड़ों ने कहा कि एक आदमी आया था उसी ने हमें धोकर साफ किया। गायें बोली कि वह कहाँ है? हमलोग उसे देखना चाहती हैं। बछड़ों ने कहा यदि हम उसे बुलाये तो तुमलोग मार डालोगी। इसलिए हम नहीं बुलायेंगे। माताओं ने कहा कि हम मारेंगी क्यों? वह तो हमारा दयालु सहायक है।

माताओं की यह सुन्दर बात सुनकर बछड़ों ने उसे पुकारा। आदमी पेड़ से उतर आया। उसके उतरने पर गायों ने कहा कि हमलोग तुम्हारा घर देखना चाहती हैं, हमें ले चलो।

आदमी उन्हें अपने घर ले आया। उसका घर देखकर गायों को फिर लौटने की इच्छा नहीं हुई। उन्होंने आदमी से कहा, हे मालिक! अब तुम हमें अपने ही साथ रखो। हम तुम्हारी सेवा करेंगी और तुम्हारी सारी बातें मानेंगी।

आदमी ने उनकी बात मानकर अपने ही साथ रख लिया। उसने एक टेढ़ी लकड़ी खोजकर हल बनाया और बछड़ों को जोतने लगा। वह उन्हें चराने और चारा पानी का भी प्रबन्ध करने लगा।

जब भादो का महीना आया तब गोड़ा धान पक गया। आदमी उसे काटकर घर लाया और अकेले ही खा गया। उसने गाय-बैलों को नहीं दिया। जानवरों के मन में बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने आपस में विचार किया कि हम सबने मिलकर काम किया, लेकिन खाने के समय यह आदमी अकेले ही खा गया। जान पड़ता है। कि इसे हमारी चिन्ता नहीं है, इसलिए हमें फिर जंगल में चले जाना चाहिए।

ऐसा निश्चय करके वे आदमी को कोसते हुए जंगल को चल पड़े। जंगल के रास्ते में भगवान ने उनकी बात सुन ली और उनसे पूछा कि तुमलोग क्या बात करते जा रहे हो? गाय-बैलों ने कहा कि हमने आदमी के साथ मिलकर काम किया लेकिन जब अन्न उपजा तो उसने अकेले ही खा डाला। इसीलिए हमारा मन दुःखी है और हम फिर जंगल को लौटे जा रहे हैं। सिङबोंगा (भगवान) ने कहा कि तुमलोग दुःखी मत हो। उस आदमी का पालन-पोषण तो मैं भी करता हूँ लेकिन मुझे भी कुछ नहीं दिया। किन्तु इसमें उसकी कोई गलती नहीं, मेरी गलती है। मैंने इस बात का कोई नियम-धरम उसे नहीं बताया है। इसलिए चलो, लौट चलो। मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।

सब आदमी के घर लौटे। भगवान ने उसे समझाया कि काम करते समय इन गाय-बैलों ने तुम्हारी सहायता की लेकिन उपजने पर तुमने इनका भाग इन्हें नहीं दिया और अकेले ही खा गए। इसलिए आज से ऐसी भूल कभी मत करो। तुम इनकी सेवा के लिए एक दिन निश्चित करो और सब मिलकर खाओ-पीओ। मैं भी यह देखने के लिए आऊँगा। इनके घरों-गोहारों में दीये जलाओ। और लक्षी-लक्ष्मी से वरदान माँगो ।

आदमी ने भगवान के आज्ञानुसार आनन्दपूर्वक गाय-बैलों का पर्व मनाया। पीछे चलकर उसके बाल-वच्चे भी वैसा ही करने लगे।

तभी से लोग गाय-बैलों का श्रृंगार करते हैं। मांदर बजाकर नाचते-गाते हैं और दीया जलाकर दिवाली मनाते हैं जिससे सिङबोंगा को दुःख न हो।

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