मेघालय के खासी आदिवासी समुदाय की लोककथा:जब मनुष्य पृथ्वी पर उतरा
प्रस्तुति : विजोया सावियान
अनुवाद : अकील कैस
शिलौंग से तेरह मील उत्तर की ओर गुंबदाकार एक पहाड़ी है। नाम है लुम सोहपेत ब्नेंग जिसका अर्थ है-स्वर्ग की नाभि। खासी लोगों का विश्वास है कि उस पहाड़ी पर जिंग कीना क्सीयार या सोने की सीढ़ी स्थित थी, जो पृथ्वी को आकाश से जोड़ती थी, जैसे गर्भनाल गर्भस्थ शिशु को उसकी मां से जोड़े रखती है। उस समय मनुष्य जाति आकाश पर ही रहती थी।
तब मनुष्यों में एक प्रथा प्रचलित थी, जिसके अनुसार सभी लोगों को इस विशाल सीढ़ी से पृथ्वी पर हर दिन उतरना होता था। वे यहां दिन-भर मेहनत करते, खेती करते और फसल उगाकर लाभ कमाते और शाम होने पर उस स्वर्ण-सोपान के सहारे आकाश में लौट जाते। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा।
तब उन लोगों में से एक के मन में पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा जागी। वह आकाश में यू ब्लेई यानी सर्वशक्तिमान सृष्टा के राज्य में अब और रहना नहीं चाहता था। वह कई महीने गुप्त रूप से और सावधानीपूर्वक अपने सपने को सच में बदलने के लिए योजनाएं बनाता रहा। आखिर अपनी योजना के अनुसार, जब भी उसे अवसर मिलता वह सीढ़ी को थोड़ा-थोड़ा काटने की कोशिश में लग जाता।
एक दिन जब पृथ्वी पर आकाश से केवल सात परिवारों के लोग काम करने के लिए उतरे थे, वह व्यक्ति अपना उद्देश्य पूरा करने में सफल हो गया। जब लोग अभी खेतों में जुटे थे, उसने सीढ़ी पर पूरी शक्ति से प्रहार किया और वह नीचे आ गिरी। इस प्रकार वे सातों परिवार के लोग पृथ्वी पर सदा-सर्वदा के लिए रहने को बाध्य हुए और उस व्यक्ति का सपना साकार हुआ। कहते हैं कि दुनिया के तमाम लोग उन सातों परिवार की ही संतान हैं, जो कालांतर में समस्त महादेशों में फैल गए।
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