शुक्रवार, 28 जून 2024

परहिया आदिवासी समुदाय की लोककथा: एक रोमांचक लड़ाई-parhiya aadiwasi samuday ki lokakatha: ek romanchak ladai

परहिया आदिवासी समुदाय की लोककथा: एक रोमांचक लड़ाई

उस वर्ष पलामू जिले में पशु गणना का कार्य चल रहा था और बालूमाथ प्रखंड में मुझे भी उसका पर्यवेक्षण करने का कार्य सौंपा गया था। पशु गणना के पर्यवेक्षण में एक दिन बालूमाच प्रखंड के डोरांग गाँव के लिए हेरहंज से सुबह नाश्ते के बाद मैंने स्थानीय जनसेवक, ग्रामसेवक तथा कल्याण सेवक के साथ प्रस्थान किया और पैदल मार्ग से पहाड़ी पगडंडी और घने जंगल के बीच से गुजरने वाली तंग घाटी के रास्ते हम सभी डोरांग गाँव पहुँचे। वह गाँव भी एक पहाड़ी पर बसा हुआ था जो चारों ओर से सघन वनों से घिरा हुआ था। गाँव के उत्तरी भाग में डोरांग नदी प्रवाहित होती थी।

डोरांग पहुंचने पर पूरा गाँव खाली था और कुछ महिलाएँ और बच्चे ही दिखाई पड़ रहे थे। पूछने पर पता चला कि गाँव से कुछ दूरी पर वहाँ के लोग एक वृहत भोज की तैयारी में लगे हुए थे। उत्सुकतावश हमलोग भी उसी ओर लोगों से मिलने के लिए चल दिये। वहाँ पहुंचने पर वहाँ का दृश्य देखकर मन आश्चर्य से भर गया। वहाँ एक विशालकाय जंगली सूअर को काटकर मांस का ढेर लगाया गया था और अब उसे आपस में बॉटने का कार्य शुरू होनेवाला था।

वहाँ के एक परिचित ग्रामीण को बुलाकर पूछने पर एक बड़ी ही रोमांचक घटना की जानकारी मिली। मालूम हुआ कि जिस घाटी से होकर हमलोग आये थे, उसी दिन सुबह लगभग तीन बजे एक बाघ अपने शिकार की खोज में पहाड़ी से नीचे उतरा था और घाटी में एक विशाल जंगली सूअर (वाराह) से उसकी भिड़ंत हो गयी थी। बाघ की दहाड़ और जंगली सूअर की गुराहट की आवाज से पूरा गाँव जाग गया था। दोनों का मल्लयुद्ध लगभग आधे घंटा तक चलता रहा। उसके बाद सबकुछ शांत हो गया था।

सूर्य निकलते ही गाँव के लोग टांगी, बलुआ, लाठी आदि के साथ घाटी में उतरे थे। कुछ दूर जाने पर एक झाड़ी में जंगली सूअर का क्षत-विक्षत शरीर पड़ा हुआ था और वहाँ लगभग सौ वर्गगज के क्षेत्र का झाड़-झंखाड़ दोनों के युद्ध से तहस-नहस हो गया था। गाँव के लोग दूर-दूर तक बाघ की खोज में गये थे। कुछ दूर तक घायल बाघ के खून के छींटे मिले, परन्तु घायल बाघ का कोई अता-पता नहीं चला। लोग बॉस-बल्ली की मदद से लगभग चार मन के उस वाराह (सूअर) को टाँगकर गाँव लाये थे। वह नर सूअर था और मैं उसके दाँत को प्राप्त करने का इच्छुक था। परन्तु उसके दाँतों को किसी व्यक्ति ने पहले ही निकाल लिया था। अब गाँव वाले उसके चर्बीदार मांस के लिए अधिक लालायित थे। हमलोग भी उस रणभूमि को देखना चाहते थे। इसलिए कुछ ग्रामीणों के साथ उस घाटी की ओर चल दिये, जहाँ बाघ और वाराह का मल्लयुद्ध हुआ था। घटनास्थल पर पहुँचने पर वहाँ खून के छींटे और बाघ के रोएँ चारों तरफ काफी दूर तक फैले हुए थे। लगता था कि वाराह के नुकीले और मजबूत दाँतों से बाघ भी बुरी तरह घायल हुआ होगा। वहाँ के तहस-नहस हुए वनस्पतियों को देखने से ही दोनों के मल्लयुद्ध की भयंकरता का अनुमान लगाया जा सकता था। हम सभी पशु गणना के कार्य का पर्यवेक्षण कर दूसरे सड़क मार्ग से हेरहंज वापस आ गये। आज भी बाघ और वाराह का वह रोमांचक मल्लयुद्ध का दृश्य याद आज कर मन रोमांचित हो उठता है।
संदर्भ:
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख लोककथा पृष्ठ 237

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