मिजो आदिवासी समूह की लोककथा: मिज़ो जाति का जन्म
प्रस्तुति: डॉ. एल.टी. लियाना खियांगते
अनुवाद : अकील कैस
ऐसे तो मिजो लोगों के उद्भव के संबंध में बहुत सारी कहानियां कही जातो हैं और उनमें कुछ कहानियां काफी रोचक भी हैं। एक लोकप्रिय मिजो अनुश्रुति के अनुसार उनके पूर्वज पृथ्वी में छिनलुङ नामक स्थान में एक पर्वत में बने एक बड़े छिद्र से निकले थे। छिनलुङ का अर्थ है-'छिद्र बंद करने का बड़ा पत्थर।' इस कथा के अनुसार पृथ्वी में एक बड़ा छिद्र था, जिसमें से मिजो समाज की विभिन्न उपजातियां, एक-एक करके बाहर आई थीं। छिद्र से बाहर निकलते समय बातूनी प्रकृति के राल्टे कबीले के लोगों ने इतना शोर मचाया कि मनुष्यों का रक्षक भी भयभीत हो गया। उनका शोर सुनकर उसने अनुमान लगाया की वे लोग भारी संख्या में हैं और यदि ये सारे-के-सारे छिद्र से बाहर निकल आएंगे तो पूरी-की-पूरी पृथ्वी इन्हीं से भर जायेगी, तो बाकी लोगों को कहां रखेंगे? इसलिए उसने उन्हें पूरी संख्या में निकलने से पहले ही छिद्र बंद कर दिया। यही कारण है कि दूसरे आदिवासी समुदायों की तुलना में मिजो लोगों की संख्या कम है।
गुफानुमा पत्थर के ढांचे से मिजो लोगों के पृथ्वी पर बाहर आने को इस प्राचीन कथा के पीछे कोई तर्क ढूंढ़ना कठिन है। एक अनुमान यह भी है कि ये लोग इजरायल से पलायन करके आ रहे थे, तो रास्ते में चीन में रुक गए और चीन की दीवार के निर्माण में लग गए। दूसरी कथा यह भी है कि चीन की दिवार के निर्माता इन श्रमिकों का एक भाग दक्षिण-पश्चिम दिशा में आगे प्रवास कर गया। दीवार के निर्माण में मजदूरों के रूप में काम करने को मजबूर ये लोग अंततः उस पर दीवार के नीचे से सुरंग खोदकर भाग निकले होंगे, जिसे ये छिद्र की संज्ञा देते हैं। यही आज का मिजो समुदाय है। दिलचस्प तथ्य यह है कि कई अन्य जनजातियों यथा पाइये, पवी, लखेर, थहडो, कूकी, राल्टे तथा कुकी एवं चिन समूह के कुछ अन्य कबीलों में भी गुफा के मुख को पत्थर से बंद कर दिये जाने वाली कथा प्रचलित है। एक प्रकार से मिजो जनजाति तथा कुकी-चिन समूह की अन्य जातियों का मूल एक होने की यह कथा तर्कसम्मत लगती है।
संदर्भ:
रमणिका गुप्ता- पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथा
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