'हो' आदिवासी की लोककथा: हेरो पर्व
प्राचीन काल में एक गाँव में चार भाइयों का एक "हो" परिवार रहता था। सभी भाई कुंआरे थे और एक ही साथ रहते और खाते-पीते थे। उनके घर से कुछ दूरएक अन्य परिवार रहता था जो "हेरो" पर्व मनाया करता था। इस पर्व में चावल पीसकर आटा बनाकर उससे रोटी बनाते थे और उसी आटा को घोलकर दीवार पर मानव और घोड़ा की आकृति बनाते थे।
एक दिन बड़ा भाई गाँव में गया और एक नारी का भीत्तिचित्र देखा। उसने उसी प्रकार की लकड़ी की मानव आकृति बनाकर रात में उसी भीत्तिचित्र पर चिपका दिया। उसने इस सम्बन्ध में किसी को कुछ नहीं बताया।
दूसरे दिन दूसरा भाई जब गाँव में घूमने गया तो उसने काठ की मूर्ति को देखा। जब रात हो गयी तो उसने चुपके से जाकर उस काठ की मूर्ति पर मिट्टी का लेप चढ़ा दिया। तीसरा भाई ने भी उस मूर्ति के देखा और रात में जाकर उसे विभिन्न रंगों से रंग दिया और मोतियों से सजा दिया। सबसे छोटा भाई चौथे दिन वहाँ गया और सोचा कि क्यों न उस सुन्दर मूर्ति में प्राण डाल दें। उसने इतनी तन्मयता और भक्तिपूर्वक सिंगबोंगा की प्रार्थना की कि उन्होंने प्रसन्न होकर उस मूर्ति में प्राण डाल दिया। वह मूर्ति शीघ्र ही एक सुन्दर युवती में परिवर्तित हो गयी। छोटा भाई उसे घर ले आया और अपने कमरे में उसे रख दिया।
दूसरे दिन अन्य तीनों भाइयों ने उस युवती को देखा। तीसरे भाई ने पूछा कि क्या उसने उस युवती को उसी घर से प्राप्त किया है, जहाँ मूर्ति बनी थीं। जब छोटे भाई ने हामी भर ली तो तीसरे भाई ने कहा, "अच्छी बात है। उस
पर में मेरा अधिकार होना चाहिए क्योंकि मैंने ही उस मूर्ति को सजाया था।" दूसरे भाई ने अपना अधिकार जताते हुए कहा, "यह मेरी है क्योंकि लकड़ी के मूर्ति का लेप लगाने का कार्य मैंने किया था।"
इस प्रकार वह सुन्दर एवं आकर्षक युवती को लेकर चारों भाइयों में काफी संघर्ष होने लगा। अन्त में यह बात गाँव की पंचायत में गयी। पंचों ने अपना फैसला बड़े भाई के पक्ष में दिया और अन्य भाइयों को इस फैसले को स्वीकार करना पड़ा। उसी समय से "हो" लोग "हेरो" पर्व धूमधाम से मनाते हैं और सुन्दर-सुन्दर चित्र बनाते हैं।
संदर्भ:
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख जनजातीय लोककथा
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