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मंगलवार, 25 जून 2024

पूर्वोत्तर भारत के बोड़ो आदिवासी समुदाय की 'बिजली और बादल की गर्जन' की लोककथा


 पूर्वोत्तर भारत के बोड़ो आदिवासी समुदाय की 'बिजली और बादल की गर्जन' की लोककथा


प्रस्तुति: डॉ. मंगल सिंह हाजोवारी

अनुवाद : अकील कैस

किसी स्थान पर एक वृद्ध दंपत्ति रहता था। उनके एक पोता और एक पोती थी। पोते का नाम राओना था और पोती का राओनी। बूढ़े-बूढ़ी के न तो कोई बेटा था और न कोई बेटी। इसलिए वे अपना सारा प्यार अपने पोते-पोती पर न्योछावर करते थे। अपने दादा-दादी के प्यार में पगे दोनों भाई-बहन राओना और राओनी जवान हो गए। वृद्ध दंपत्ति राओना तथा राओनी की किसी और से शादी करवाकर उन्हें खोना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंन दोनों भाई-बहन की आपस में ही शादी करवाने की एक गुप्त योजना बनाई ।

एक दिन बूढ़ा घर से बाहर गया और लौटने पर राओना और राओनी को उसने बताया कि उसने राओना के लिए दुल्हन का चुनाव कर लिया है और व्याह की तैयारी भी शुरु कर दी है।

एक दिन बुढ़िया आंगन में धान सुखा रही थी। कई चिड़ियां वहां आकर धान चुगने लगीं। बुढ़िया उन्हें हांकती हुई बोली- "भाग जाओ, भाग जाओ। धान मत खाओ। राओना-राओनी की शादी के दिन जितना खाना हो खा लेना!"

संयोगवश, राओनी ने बुढ़िया की बात सुन ली। उसकी अटपटी बात राओनी के पल्ले नहीं पड़ी। उसने एकांत में बुढ़िया से उसका अर्थ पूछा। बुढ़िया शुरू-शुरू में उसे कुछ बताने को राजी नहीं हुई, पर राओनी की जिद के आगे उसकी एक न चली। उसने सारी योजना राओनी को बता दी। यह जानकर कि बूढ़े-बूढ़ी उसकी शादी उसके अपने ही भाई राओना के साथ करवाना चाहते हैं, उसने जोरदार विरोध किया। वह जानती थी कि यदि ऐसा हुआ तो वे समाज में वे उपहास के पात्र बन जाएंगे। उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि चाहे जैसे भी हो, वह इस योजना को पूरा नहीं होने देगी।

आखिर उसने इस आसन्न संकट से बचने का एक उपाय सोच निकाला। उसने घर के आंगन में खोखलिंङ का पौधा लगाया और प्रतिदिन उसके नीचे एक दिया जलाकर प्रार्थना करने लगी कि पौधा खूब जल्दी बढ़े और इतना बढ़े कि अंततः वह आसमान को छू ले। उसने यह भी कामना की कि कोई उस पौधे को काट न सके। उसकी मनोकामना पूरी हुई और पौधा बढ़ते-बढ़ते सचमुच आसमान तक पहुंच गया।

एक दिन राओनी उस खोखलिङ पेड़ पर चढ़ने लगी। उसने दो मुर्गे भी अपने साथ ले लिए। जब राओनी ने प्रार्थना शुरू की तो मुर्गे भी बांग देने लगे।

उधर राओना इन सारी बातों से बेखबर था। वह भी खोखलिङ पेड़ पर चढ़कर राओनी का पीछा करता हुआ आकाश की ओर चल पड़ा। राओनी तो तब तक आकाश में पहुंच चुकी थी। राओना भी हार माननेवाला नहीं था। उसने निश्चय किया कि वह राओनी को ढूंढ़ निकालेगा। वह शेर की तरह गरजता हुआ बढ़ा जा रहा था। आखिर वह भी आकाश में जा पहुंचा।

आकाश में पहुंचकर राओनी ने छिपने की कोशिश की ताकि राओना उसे ढूंढ़ न सके, इसलिए उसने बादलों के बीच शरण ले ली। राओना ने उसे ढूंढ़ने में कोई कसर न रखी और उसे मालूम हो गया कि राओनी कहां छिपी है। अब राओनी एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपना दोखना (बोडो स्त्रियों का पहनावा) ऊपर उठाए भागती फिरने लगी। दोखना ऊपर उठ जाने के कारण जब-जब उसके नितंब नजर आते तो वे आकाश में बिजली बनकर चमकने लगते। उधर राओना शेर की तरह दहाड़े मारता हुआ उसके पीछे बेतहाशा भाग रहा था। उसकी वही दहाड़, वही गर्जन बादलों की गर्जन बन गई। बिजली की चमक और बादल की गर्जना की उत्पत्ति की यही लोककथा, बोडो के जनमानस में प्रचलित है।
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संदर्भ: पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथा पुस्तक