मुंडा आदिवासी समुदाय की 'हीरा राजा' की लोककथा
मुण्डाओं के राजा भूपति राय का एक भण्डारी था। जिसका नाम बिरजू भण्डारी था। उसने राजा के लिए पिठौरिया में एक गढ़ बनवाया। राजा पविरागढ़ से पिठौरिया आता-जाता था और कुछ दिन वहाँ रहता था। वहीं उसको एक पुत्र हुआ जिसका नाम हीरा राजा रखा गया। भूपति राय के मर जाने पर हीरा राजा को राजा बनाया गया।
एक बार हीरा राजा ने महाराजा को पूरी मालगुजारी नहीं दी। महाराजा दुर्जन साल ने बिगड़कर हीरा राजा को पकड़ने के लिए अपने सिपाहियों को भेजा। दुर्जन साल के सिपाहियों ने आकर गढ़ को घेर लिया। हीरा राजा अपने साथ दो हीरे लेकर और घोड़े पर चढ़कर भाग निकला।
सिपाहियों ने हीरा राजा का पीछा किया और कुछ दिन पीछा करते-करते उसे पकड़ लिया। वे महाराजा के पास ले गए। हीरा राजा ने मालगुजारी पूरी करने के लिए एक हीरा महाराजा को दे दिया। लेकिन तिस पर भी महाराजा ने उसे नहीं छोड़ा और वर्ष भर के लिए जेल में डाल दिया।
और उसके दिए हुए हीरे की जाँच के लिए महाराजा ने एक लुहार को बुलाया। लुहार ने ज्योंही हीरे को निहाय पर रखकर घन से मारा कि हीरा निहाय मैं घुस गया। महाराजा चकित हो गए। उन्होंने हीरे को निकालने की बहुत कोशिश की किन्तु सफलता नहीं मिली। तब उन्होंने सोचा कि उसे हीरा राजा ही निकाल सकता है।
जब हीरा राजा को लाने के लिए सिपाही उसके पास गए तो उसने कहा कि जब तक मैं कैद से नहीं छूटता तब तक नहीं जा सकता और न हीरा को निकालने का उपाय बता सकता हूँ।
सिपाहियों से यह बात सुनकर महाराजा ने हीरा राजा को छोड़ देने की आज्ञा दी। लोग उसे महाराजा के पास ले आए। हीरा राजा ने अपना दूसरा हीरा निहाय में घुसे हुए हीरे के सामने किया। तुरन्त वह उछल कर बाहर निकल आया। महाराजा ने उसी दिन से हीरा राजा को छुट्टी दे दी और अपने राज्य के सभी राजाओं से बड़ा बनाया।
जेल से घर आकर हीरा राजा ने पत्थर का एक गढ़ बनवाना शुरू किया। उसने नौ कारीगर बुलवाया गढ़ में नौ कोठे उठाए। प्रत्येक में नौ-नौ कोठरियों बनी और नौरतन-गढ़ उसका नाम रखा।
हीरा राजा ने अपने राज्य का बड़ा उत्तम प्रबन्ध किया।
उसके राज्य में एक विधवा स्त्री के बच्चे ने एक दिन तालाब के नाले में कुमुनी रोपी। जब वह सबेरे पहुँचा तो कुमुनी में एक भी मछली नहीं थी, उनकी जगह पत्थर की गोलियों भरी थीं। उन्हें बेकार समझ कर केवल एक गोली लेकर लड़का घर आया। जब रात हुई तो गोली में से प्रकाश फूट पड़ा। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि यदि सारी गोलियाँ लायी होती तो बड़ा अच्छा था।
एक दिन वह अपनी गोली लेकर बाजार गया और उसे एक बनिये को बेच दिया। बनिये ने पैसा तो नहीं दिया पर पाँच वर्ष तक उसके लिए हल्दी मसाला और नमक का खर्च चलाते रहने का वादा किया।
वह हीरा था। बनिया उसे हीरा राजा के पास ले गया। राजा ने पूछा कि यह हीरा तुम्हें कहाँ मिला? बनिये ने बताया कि इसे मैंने एक विधवा के बेटे से खरीदा था। लड़के ने मछली मारने वाली कुमुनी में उसे पाया था। यह सुनकर हीरा राजा ने अपने छोटे भाई के साथ मिलकर नाले को बाँध दिया।
जब बाँध बन गया तो उसमें इतना पानी भर गया कि नाली से रात-दिन बहने पर भी तालाब खाली नहीं हुआ। यह देखकर राजा ने मल्लाहों को बुलाया और अपना हीरा तालाब में फेंक कर उन्हें खोजने की आज्ञा दी। लेकिन दिन-रात खोजने पर भी वे नहीं पा सके। वे तालाब के ही अन्दर रोने लगे।
अब हीरा राजा स्वयं तालाब में घुसा और सात दिन सात रात पानी में डूबा रहा। राजा को बाहर आते नहीं देखकर लोगों ने समझा कि वह डूब मरा या पानी के जन्तुओं ने उसे खा डाला। वे सब अपने-अपने घर लौट गए। एक मल्लाह और एक घासी दो आदमी वहाँ रह गए।
सात दिन के बाद हीरा राजा अपने हाथ में तीन हीरे पकड़े हुए निकला और बोला कि यहाँ कौन-कौन आदमी है। मुझे पानी पिलाओ।
घासी ने कहा, हे राजा! मैं तुम्हें कैसे पानी पिलाऊँ? तब मल्लाह ने राजा को पानी पिलाया। राजा ने मल्लाह से कहा कि आज से तुम ब्राह्मण कहलाओगे और सभी जातियों के लोग तुम्हारा पानी पीयेंगे।
राजा ने फिर घासी से कहा कि तुमने मेरे घोड़े की रखवाली की इसलिए आज से नायक कहलाओगे। राजा ने उसे सिमूहातू नामक गाँव दिया। जिस समय हीरा राजा तालाब में डूबा हुआ था, उस समय सबने समझ लिया था कि वह मर गया। यह खबर पाकर एक बड़ाइक हीरा राजा की जगह राजा बन बैठा था। लौटने पर जब राजा ने अपनी गद्दी पर उसे बैठा देखा तो उसे बड़ा क्रोध आया और आज्ञा दी कि सारी बड़ाइक जाति को काटकर मार डालो। सिपाहियों ने उन्हें ढूँढ़ ढूँढ़ कर मारना शुरू किया। एक बड़ाइक भागते हुए एक जुलाहे के करघे के गड्ढे में छिप गया। सिपाहियों ने वहाँ पहुँचकर जुलाहे से पूछा कि क्या किसी को इधर भागकर आते देखा? जुलाहे ने बहाना बना दिया। जाति में वही एक बच रहा। तभी से बड़ाइक लोग कपड़ा बुनने का काम करने लगे।
कुछ दिन बाद हीरा राजा पिठौरिया से सारा धन-दौलत लेकर ढोयसागढ़ में आया और वहीं रहकर राज चलाने लगा।
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