शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

मेघालय के खासी आदिवासी समूह की लोककथा: मोर के पंख सुंदर कैसे बने ?

 मेघालय के खासी आदिवासी समूह की लोककथा: मोर के पंख सुंदर कैसे बने ?


प्रस्तुति : विजोया सावियान

अनुवाद : अकील कैस

एक समय था जब मोर धूसर रंगवाला मामूली पक्षी था। तब उसकी पूंछ आज की ही तरह लंबी थी और चाल में इठलाहट और दंभ भी, पर उसमें सुंदरता लेशमात्र भी न थी।

कहते हैं कि एक दिन जंगल के सारे जानवर का स्नगी यानी सूर्य को अपना अभिवादन पहुंचाने के लिए एक दूत का चुनाव करने के लिए एकत्र हुए। का स्नगी अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थी। इस काम के लिए कई पक्षी उम्मीदवार बने। विचार-विमर्श के बाद मोर का चुना जाना तय हुआ। उसे अपनी शाही शानदार चाल और बड़े तथा मजबूत पंखों के कारण चुना गया। आखिर कुछ दिनों की तैयारी के बाद उसने अपने मित्रों से विदा ली और पखेरू पंख फैलाए आकाश में उड़ चला।

का स्नगी अपने विशाल साम्राज्य में अकेली रहती थी, इसलिए मोर के आने पर वह बहुत खुश हुई। उसने मोर के सत्कार में कोई कसर बाकी न रखी और शानदार ढंग से पूरे ऐशो-आराम के साथ उसे ठहराया। मोर ने भी अपने व्यवहार में उतनी ही शिष्टता और भद्रता दिखाई। शीघ्र ही उसने का स्नगी के दिल में अपनी जगह बना ली। वह उसका सबसे प्रिय पात्र बन गया।

कुछ समय तक सब कुछ भली-भांति चल रहा था कि एक दिन मोर ने महसूस किया कि प्रेमासक्त का स्नगी के लिए वह कितना महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य बन गया है। बस अहंकार उसके सिर पर चढ़ गया और वह स्वार्थी हो गया। का स्नगी उसकी फरमाइशें पूरी करने का हर संभव प्रयास करती। उसकी सनक-भरी अपेक्षाओं को संतुष्ट करती। मोर की किसी भी इच्छा को उसने अधूरा नहीं छोड़ा। मोर की सेवा में सन्नद्ध वह धीरे-धीरे शासन कार्य, अपनी प्रजा तथा उसके प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगी।

उघर नीचे पृथ्वी पर, क्या पशु और क्या मनुष्य सभी के सभी का स्नगी के छिटपुट दर्शन होने के कारण, उससे एकदम क्षुब्ध हो गए थे। बादलों भरे, बरसात के ठंडे दिन और उदास मौसम से जूझना पड़ता था उन्हें। चिड़ियों ने चहचहाना बंद कर दिया था। पेड़ों की पत्तियां अपना रंग खो बैठी थीं।

इस दुःखद स्थिति का कारण समझ आ जाने पर लोग एक बार फिर एकत्र हुए। वे मोर को पृथ्वी पर वापस बुलाने का उपाय देर तक सोचते रहे।

घंटों माथा-पच्ची करने के बाद भी उन्हें कोई समाधान नहीं सूझा। अंततः लोगों ने जंगल की सबसे ज्यादा उम्रदराज बुढ़िया से सलाह लेने का निश्चय किया। वृद्धा जंगल में लोगों के बीच 'बुद्धिमान वृद्धा' के नाम से जानी जाती थी।

लोगों की समस्या सुनकर कुछ देर तक बुद्धिमान वृद्धा मुंह चलाती रही। फिर बोली, "मेरे दोस्तो, यदि आप चाहते हैं कि मैं आपकी समस्या का हल बताऊं तो आपसे दो अनुरोध हैं। ध्यान से सुनिए। पहली बात यह कि आप जंगल में कटाई कर एक बड़ा खंड साफ करें ताकि मैं वहां सरसों के बीज लगा सकूं। दूसरी बात, सभी को समझा दें कि न तो कोई पक्षी वहां से एक भी दाना चुगेगा और न कोई पशु उन पर चढ़ेगा।"

सरसों के खेत की देखभाल में बुद्धिमान वृद्धा व्यस्त हो गई और इस तरह कई महीने बीत गए। लोग अचंभे में थे कि आखिर बुद्धिमान बुढ़िया की युक्ति है क्या? वह लगातार कई घंटों तक खेतों से घास-फूस की सफाई-सुथराई में जुटी रहती। आखिर सरसों के पौधे उग आए। उसने सरसों के खेतों को वृत्ताकर शक्ल दी थी। अपनी उत्सुकता के बावजूद बुद्धिमान वृद्धा से पूछने का साहस कोई भी न करता कि आखिर वह कर क्या रही है। यह बुढ़िया अपने मितभावी स्वभाव और प्रचंड कोच के लिए प्रसिद्ध थी। अंततः वे दिन भी आए कि सरसों फूलने लगी।

मोर के दिन तो आसमान में ऐशो-आराम के कट रहे थे पर का स्नगी के प्रेमातिरेक से यह कुछ ऊबने लगा था। एक सुबह महल के फाटक के बाहर टहलते हुए उसकी नजर पृथ्वी पर पड़ी, तो उसने जंगल के बीच स्थित एक अत्यंत आकर्षक दृश्य देखा। इतना सुंदर दृश्य उसने तब तक जीवन में देखा ही न था। चमकदार सोने के वस्त्र पहने वहां एक सुंदर कन्या लेटी थी। उसने तुरंत उस सुंदरी से मिलने और उसे अपने वश में करने का निश्चय किया।

जब का स्नगी ने मोर के नए प्रेम और उसके वहां से चले जाने के बारे में

सुना, तो उसका दिल टूट गया।

"मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ।" उसने मोर से अनुरोध किया। "में फिर एकाकी जीवन बिताना नहीं चाहती।"

मगर मोर के कान पर जूं न रेंगी। उसने उपेक्षापूर्वक उसे अलविदा कहा और पृथ्वी की ओर अपनी वापसी का सफर शुरू कर दिया।

का स्नगी काफी समय तक, उसका पीछा करती रही। यह पूरे समय रोती रही। जैसे-जैसे उसके आंसू मोर के शरीर पर गिरते थे, वहां चटखदार रंग बिखेर देते। मोर के धूसर पंख इतने सुंदर हो गए कि किसी ने ऐसे पंख कभी देखे ही न थे।

मोर जब पृथ्वी पर लौटा तो उसकी सुंदर छवि देख सभी चकित रह गए। यह सोचकर कि अब का स्नगी पुनः राजकाज में जुट जाएगी, वे खुश हो गए। पर मोर यह देख कुपित हो गया कि यह सुंदर लेटी हुई कन्या कुशलता से बनाया गया सरसों का खेत था। लेकिन अब उसके वश में था भी क्या? वह अब इतना मोटा और भारी हो गया था कि पुनः आकाश में उड़कर जाना उसके लिए संभव न था।

प्रत्येक सुबह आज भी जब वह अपने खोए हुए का स्नगी के प्यार को अपने सामने आते देखता है, तो वह हमेशा की तरह अपने पंख फड़फड़ाकर फैला देता है और उसे सलाम करता है। आखिर का स्नगी के आंसुओं की बूंदों से रंजित उसके भव्य व मनोहर पंख उसके प्रेम की निशानी जो हैं!

संदर्भ

रमणिका गुप्ता-पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथाएं पृ 156-158


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गुरुवार, 4 जुलाई 2024

हो आदिवासी की लोककथा: हेरो पर्व-Ho aadiwasi ki lokakatha: Hera parv


 'हो' आदिवासी की लोककथा: हेरो पर्व


प्राचीन काल में एक गाँव में चार भाइयों का एक "हो" परिवार रहता था। सभी भाई कुंआरे थे और एक ही साथ रहते और खाते-पीते थे। उनके घर से कुछ दूरएक अन्य परिवार रहता था जो "हेरो" पर्व मनाया करता था। इस पर्व में चावल पीसकर आटा बनाकर उससे रोटी बनाते थे और उसी आटा को घोलकर दीवार पर मानव और घोड़ा की आकृति बनाते थे।

एक दिन बड़ा भाई गाँव में गया और एक नारी का भीत्तिचित्र देखा। उसने उसी प्रकार की लकड़ी की मानव आकृति बनाकर रात में उसी भीत्तिचित्र पर चिपका दिया। उसने इस सम्बन्ध में किसी को कुछ नहीं बताया।

दूसरे दिन दूसरा भाई जब गाँव में घूमने गया तो उसने काठ की मूर्ति को देखा। जब रात हो गयी तो उसने चुपके से जाकर उस काठ की मूर्ति पर मिट्टी का लेप चढ़ा दिया। तीसरा भाई ने भी उस मूर्ति के देखा और रात में जाकर उसे विभिन्न रंगों से रंग दिया और मोतियों से सजा दिया। सबसे छोटा भाई चौथे दिन वहाँ गया और सोचा कि क्यों न उस सुन्दर मूर्ति में प्राण डाल दें। उसने इतनी तन्मयता और भक्तिपूर्वक सिंगबोंगा की प्रार्थना की कि उन्होंने प्रसन्न होकर उस मूर्ति में प्राण डाल दिया। वह मूर्ति शीघ्र ही एक सुन्दर युवती में परिवर्तित हो गयी। छोटा भाई उसे घर ले आया और अपने कमरे में उसे रख दिया।

दूसरे दिन अन्य तीनों भाइयों ने उस युवती को देखा। तीसरे भाई ने पूछा कि क्या उसने उस युवती को उसी घर से प्राप्त किया है, जहाँ मूर्ति बनी थीं। जब छोटे भाई ने हामी भर ली तो तीसरे भाई ने कहा, "अच्छी बात है। उस

पर में मेरा अधिकार होना चाहिए क्योंकि मैंने ही उस मूर्ति को सजाया था।" दूसरे भाई ने अपना अधिकार जताते हुए कहा, "यह मेरी है क्योंकि लकड़ी के मूर्ति का लेप लगाने का कार्य मैंने किया था।"

इस प्रकार वह सुन्दर एवं आकर्षक युवती को लेकर चारों भाइयों में काफी संघर्ष होने लगा। अन्त में यह बात गाँव की पंचायत में गयी। पंचों ने अपना फैसला बड़े भाई के पक्ष में दिया और अन्य भाइयों को इस फैसले को स्वीकार करना पड़ा। उसी समय से "हो" लोग "हेरो" पर्व धूमधाम से मनाते हैं और सुन्दर-सुन्दर चित्र बनाते हैं।
संदर्भ: 
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख जनजातीय लोककथा
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बुधवार, 3 जुलाई 2024

मिजो आदिवासी समूह की लोककथा: मिज़ो जाति का जन्म-mijo aadiwasi samuh ki lokakatha: mijo jati ka janm

 


मिजो आदिवासी समूह की लोककथा: मिज़ो जाति का जन्म


प्रस्तुति: डॉ. एल.टी. लियाना खियांगते 

अनुवाद : अकील कैस

ऐसे तो मिजो लोगों के उद्भव के संबंध में बहुत सारी कहानियां कही जातो हैं और उनमें कुछ कहानियां काफी रोचक भी हैं। एक लोकप्रिय मिजो अनुश्रुति के अनुसार उनके पूर्वज पृथ्वी में छिनलुङ नामक स्थान में एक पर्वत में बने एक बड़े छिद्र से निकले थे। छिनलुङ का अर्थ है-'छिद्र बंद करने का बड़ा पत्थर।' इस कथा के अनुसार पृथ्वी में एक बड़ा छिद्र था, जिसमें से मिजो समाज की विभिन्न उपजातियां, एक-एक करके बाहर आई थीं। छिद्र से बाहर निकलते समय बातूनी प्रकृति के राल्टे कबीले के लोगों ने इतना शोर मचाया कि मनुष्यों का रक्षक भी भयभीत हो गया। उनका शोर सुनकर उसने अनुमान लगाया की वे लोग भारी संख्या में हैं और यदि ये सारे-के-सारे छिद्र से बाहर निकल आएंगे तो पूरी-की-पूरी पृथ्वी इन्हीं से भर जायेगी, तो बाकी लोगों को कहां रखेंगे? इसलिए उसने उन्हें पूरी संख्या में निकलने से पहले ही छिद्र बंद कर दिया। यही कारण है कि दूसरे आदिवासी समुदायों की तुलना में मिजो लोगों की संख्या कम है।

गुफानुमा पत्थर के ढांचे से मिजो लोगों के पृथ्वी पर बाहर आने को इस प्राचीन कथा के पीछे कोई तर्क ढूंढ़ना कठिन है। एक अनुमान यह भी है कि ये लोग इजरायल से पलायन करके आ रहे थे, तो रास्ते में चीन में रुक गए और चीन की दीवार के निर्माण में लग गए। दूसरी कथा यह भी है कि चीन की दिवार के निर्माता इन श्रमिकों का एक भाग दक्षिण-पश्चिम दिशा में आगे प्रवास कर गया। दीवार के निर्माण में मजदूरों के रूप में काम करने को मजबूर ये लोग अंततः उस पर दीवार के नीचे से सुरंग खोदकर भाग निकले होंगे, जिसे ये छिद्र की संज्ञा देते हैं। यही आज का मिजो समुदाय है। दिलचस्प तथ्य यह है कि कई अन्य जनजातियों यथा पाइये, पवी, लखेर, थहडो, कूकी, राल्टे तथा कुकी एवं चिन समूह के कुछ अन्य कबीलों में भी गुफा के मुख को पत्थर से बंद कर दिये जाने वाली कथा प्रचलित है। एक प्रकार से मिजो जनजाति तथा कुकी-चिन समूह की अन्य जातियों का मूल एक होने की यह कथा तर्कसम्मत लगती है।

संदर्भ: 

रमणिका गुप्ता- पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथा

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मंगलवार, 2 जुलाई 2024

हो आदिवासी समुदाय की लोककथा:वीर चेंडेया-ho aadiwasi samuday ki lokakatha:vir chnedeya


हो आदिवासी समुदाय की लोककथा:वीर चेंडेया


बहुत दिन हुए चेंडेया नामक एक चरवाहा रहता था। घने वन में उसकी एक झोंपड़ी थी। वह वन में बकरियों को चराता और अपनी छोटी-सी झोपड़ी में बकरियों के साथ रहता था। वन के कंद-मूल-फल और बकरियों का दूध ही उसका भोजन था। वह सुबह-सुबह बकरियों को लेकर जंगल में निकलजाता और संध्या समय घर वापस लौटता।

एक दिन राजा का पागल हाथी घूमता हुआ चेंडेया की झोपड़ी के पास आ पहुँचा। चेंडेया घर में नहीं था। वह तो सुबह से ही वन में बकरियाँ चरा रहा था। हाथी ने उसकी झोपड़ी तहस-नहस कर डाला और झूमता हुआ लौट गया।

संध्या समय अब वह वापस आया तो अपनी झोपड़ी को नष्ट पाकर बहुत दुःखी हुआ। परंतु उसने उसे फिर बना लिया।

दूसरे दिन फिर सुबह वह अपनी बकरियों को लेकर वन में चला गया। राजा का पागल हाथी फिर आया और उसकी झोपड़ी तहस-नहस कर डाला। संध्या समय वापस आने पर वह दुःखी हुआ। तीसरे दिन वह जंगल नहीं गया राजा का पागल हाथी फिर आया और उसकी झोपड़ी तहस-नहस करने लगा।

चेंडेया ने गरज कर हाथी को रोका और डॉटकर बोला, "बदमाश! तुमको मैं दो दिनों से देख रहा हूँ। क्या तुम मेरी शक्ति को नहीं जानते, मैं तुम्हारी सूँड़

पकड़ कर इस तरह फेंकूंगा कि तुम सात समुद्र पार दलदल में जा गिरोगे।" हाथी यह सुनकर बहुत डर गया। डर के कारण उसका पागलपन भी छूट गया। महल में आने पर उसने खाना-पीना सब छोड़ दिया।

राजा उसको बहुत प्यार करता था। उसकी ऐसी हालत देखकर राजा ने इसके कारण का पता लगाया। अन्त में सही बात का पता लग जाने के बाद चेंडेया राजा के पास लाया गया। चेंडेया ने सारी बात कह सुनायी। परंतु राजा बहुत नाराज हुआ और क्रोध में आकर बोला, "यदि तुम इसे (हाथी को) सात समुद्र पार नहीं फेंकोगे तो तुम्हें कुत्तों से नुचवाऊँगा। यदि फेंक दोगे तो तुम्हें आधा राज्य और अपनी बेटी दे दूँगा।"

चेंडेया ने शर्त मान ली। दूसरे दिन एक बहुत बड़ी भीड़ जमा हो गयी। एक बड़े मैदान में हाथी को लाया गया। चेंडेया शान के साथ आगे बढ़ा। उसने हाथी की पूंछ पकड़ी और ऐसी फेंका की किसी को अता-पता भी नहीं चला कि हाथी कहाँ गिरा।

सभी लोग चेंडेया की वाहवाही करने लगे। परंतु राजा बहुत चिन्तित हो गया कि वह एक चरवाहा से अपनी बेटी की शादी कैसे करे। अतः उसने बहाना बनाया कि चेंडेया उस हाथी को फिर यहाँ ला दे तो उसे शर्त की सारी चीजें मिल जायेंगी।

चेंडेया भी हार मानने वाला नहीं था। वह हाथी की खोज में चल पड़ा। रास्ते में उसे एक बलवान् आदमी मिला। वह लोहे के हल से चट्टान को जोत रहा था। चेंडेया बहुत खुश हुआ और उसकी खूब प्रशंसा की। पर उसने कहा कि चेंडेया के आगे तो वह तिनका भर भी नहीं है। चेंडेया बहुत खुश हुआ और असली परिचय दिया। चेंडेया ने उसे अपने साथ कर लिया और दोनों सात समुद्र पार दलदल की खोज में चल पड़े।

रास्ते में उन्हें एक और आदमी मिला। वह सात बैलगाड़ियों में लकड़ी भर कर उन्हें अपने हाथों से खींच रहा था। चेंडेया उसे देखकर बहुत खुश हुआ उसकी बहुत प्रशंसा की। परंतु उस आदमी ने कहा कि वह तो कुछ भी नहीं है। सबसे बड़ा वीर तो चेंडेया है। चेंडेया ने कहा, "मैं ही वह व्यक्ति हूँ।" यह सुनकर वह बहुत खुश हुआ और वह भी उन दोनों के साथ चल पड़ा।

बहुत दिनों तक चलने के बाद तीनों सात समुद्र पार दलदल में जा पहुँचे। तीनों ने मिलकर हाथी को दलदल से निकाला। चेंडेया दोनों को अपनी जगह छोड़कर हाथी के साथ राजदरवार में आ पहुँचा।

राजा ने चेंडेया के साथ हाथी को देखकर हार मान ली। उसने अपना आधा राज्य चेंडेया को दे दिया और अपनी पुत्री की शादी भी उसके साथ कर दी। चेंडेया जब राजा हुआ तो अपने दोनों साथियों को मंत्री और सेनापति बनाया। कुछ दिनों के बाद राजा बूढ़ा हो गया। उसे कोई लड़का नहीं था। अतएव उसने अपना सारा राज्य चेंडेया को ही दे दिया और खुद साधु बन गया।

चेंडेया बहुत शक्तिशाली राजा हुआ। उसने बहुत-से देश जीते और शान्तिपूर्वक राज करने लगा।

संदर्भ
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख जनजातीय लोककथा पृ 38-40


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सोमवार, 1 जुलाई 2024

खड़िया आदिवासी लोककथा : बाघ और बन्दर-khadiya aadiwasi lokkatha: bagh aur bandar

 


खड़िया आदिवासी लोककथा : बाघ और बन्दर


एक आदमी ने एक बन्दर पाला था। उस आदमी का नाम था धुन्धा। युन्चे ने उस बन्दर का नाम चामू रखा था। धुन्चा जिधर काम करने जाता था तो साथ मैं चामू को भी लेता जाता था। जिस समय शिकार खेलने जाते थे तो बन्दर कुत्ते के ऊपर चढ़ जाता था. मान लिया कुत्ता उसका घोड़ा था। जब वे गिलहरी पाते थे, तो बिना मारे नहीं लौटते थे (नहीं छोड़ते थे)। यदि गिलहरी वृक्ष पर चढ़ जाता था तो बन्दर भी चढ़ता और दौड़ता था। नीचे उतरता था तो आदमी और कुत्ता। कोटर में घुसता था तो बन्दर भी घुसता था। और निकालता था। ऐसा में उसको शिकार खेलने का शौक था।

एक बार धुन्धा और चामू आषाढ़ महीने में गुंगु की पत्ती तोड़ने के लिए वन गए। गुंगु की लता खूब घनी थी। उस झाड़ी में एक बाघ रहता था। वह नहीं जानता था कि यहाँ बाघ है। बन्दर है तो बन्दर ही, वह एक स्थान में नहीं रहता है। वह इधर-उधर दौड़ने लगा, इस शाखा से उस शाखा में उछलता था। उसी समय उसने बाघ को देखा। बाघ आदमी को खाने के लिए दुबकते हुए आदमी की ओर जाने लगा था। ऐसे समय में बन्दर का कार्य देख लें। उसने अपने मालिक को बचाने के लिए क्या किया? उसका मालिक पत्ती तोड़कर एक पोटली बना रहा था। वह एक पत्थर पर बैठा था। उसका मालिक बाघ के बारे में अनजान था। बन्दर ने झट अपने मालिक को छिपा लिया और अपने मालिक के स्थान पर वह काम करने लगा। बाघ आया और बन्दर से पूछता है कि बड़े भैया, चामू, क्या बनाने में लगे हो? बन्दर बोला- ढाढू कहीं के (मति मूर्ख) आज तक तुम अनजान हो। देखोगे आग बरसनेवाली है। इसी आग की वर्षा से बचने के लिए पोटली बना रहा हूँ। मैं इस पोटली में घुस जाऊँगा और अग्नि-वर्षा से बच जाऊँगा।' इस बात को सुनकर बाघ डर गया और बन्दर से बोला, 'भैया चामू, मेरे लिए पहले पोटली बना दो। मैं तो बड़ा हूँ, इसलिए मेरे लिए पहले एक बड़ी पोटली बनाओ बाद मे अपने लिए बनाना।' बन्दर ने इस बात को पसंद किया। बन्दर ने बाघ के समाने जैसा एक पोटली बनायी। वाघ घुस गया और बन्दर ने पोटली को अपने मालिक की सहायता से बाँध दिया। उन्होंने उसे एक वृक्ष के नीचे ले लिया और एक डाल पर लटका दिया। नीचे उन्होंने बड़ी-बड़ी लकड़ियों को जमा किया और आग मुलगा दी। जिस समय वाघ जलने लगा तब वह जोर से रोने लगा। बन्दर ने उसे डॉटकर कहा, चुप रहो मूर्ख, मुझे भी तो लग रहा है, मैं तो नहीं रो रहा हूँ। जैसे-जैसे आग की आँच बढ़ती जाती थी, वैसे बाघ और अधिक चिल्लाने लगा। बन्दर ने और ठूंठ लकड़ी जमा कर दी तथा बाघ का तमाशा देखने लगा। अंत में बाघ का बँधा हुआ रस्सा जल कर गिर गया और बाघ आग में जलकर राख हो गया। बन्दर अपने मालिक को दुःख से बचाया। इसी तरह जन्तु भी कभी-कभी अच्छा कार्य करते हैं।
संदर्भ:
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख जनजातीय लोककथाएं

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रविवार, 30 जून 2024

नागालैंड के आदिवासी समूह की लोककथा: लिजाबा ने सिरजी नागा धरती-nagaland ka jangali aadiwasi samuh ki lokakatha lihaja ne sitaji naga dharati

 


नागालैंड के आदिवासी समूह की लोककथा: लिजाबा ने सिरजी नागा धरती


दीपेन्द्र की प्रस्तुति

अनुवाद: रमणिका गुण

(ये मिथक मूलरूप से 'ओ' नागा जनजाति की कविता में गाई जानेवाली लोक (ये मिधारित हैं। ये जनजाति ब्रह्मपुत्र के उर्वरा मैदानों के पास बसती है। इसे अपन वैसी भी कहा जाता है, जिसे बाद में अहोम या असमी भी कहा जाने लगा। इन्हें बाहलैंड से आकर मध्य युग में इस घाटी पर कब्जा जमा लिया था। इस धरती के पास एक क्षेत्र है, जो बफर जोन की तरह काम करता है, जिसका अभी तक सीमांकन नहीं हुआ और न ही यह तय हुआ कि यह भूमि किस राज्य में है। उत्तर-पूर्व के दक्षिण-पश्चिम तक फैला हुआ असम और नागालैंड तक फैला हुआ यह इलाका लगभग 10 से 20 बीस किलोमीटर तक चौड़ा है। पहाड़ी क्षेत्र जो नागालैंड से शुरु होता है, मयांमार की घाटी चिंदविन दरिया तक फैला है और यह क्षेत्र और खड़ा व घाटियों ये ऊंचे-नीचे पहाड़ों, पतली नदियों और गहरी खाइयों व खंदको (Gorges) से पटा है। यह मूलरूप में कविता में लिखा हुआ है। हम इसे गथ में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह एक नागा-कथा है, जिसे श्री टी पेन्जू ने पढ़ा।)

मैं सुधिजन पाठकों के निमित्त सुनाता हूं नागा देश के सृजन की 'नागा औ गाया। नागाओं का यह विश्वास है कि 'लिजाबा' ने नागा देश की धरती को बनाया।

सृष्टि-सृजक लिजावा ने जब पृथ्वी का सृजन शुरू किया तो वह पश्चिम से पूर्व तक सतत् धरती का सृजन करता ही चला गया। वह दिन-भर काम करता और रात को विश्राम ! कभी नहीं थकता था वह। एक दिन एक अत्यंत ही उर्वर घाटी तैयार हो गई।

उस धरती को देख लिजावा अत्यंत ही उल्लास से भर गया! फिर क्या था। बत, कुछ दिनों के लिए उसने छु‌ट्टी ले ली और खूब आराम किया। अवकाश के बाद जब लिजाबा लौटा तो वह पूरब की तरफ धरती बनाने चल दिया।

पूर्व दिशा की ओर काम करना शुरू किया ही था कि उसके पास एक बहुत बड़ा कॉकरोच आ पहुंचा। कॉकरोच ने उसे बताया- "आगे खतरा है, सावधान हो जाओ! तुम्हारे सृजन में बाधा पड़ सकती है।" कॉकरोच पर खतरे का डर इतना हावी था कि उसे देखकर लिजावा भी सहम गया। उसका सृष्टि सृजन का सारा उत्साह कुछ ठंडा पड़ गया। उसका ध्यान बंट गया। इसलिए उसने हड़बड़ाकर बाकी की घरती जल्दी-जल्दी बना डाली।

'औ नागा' लोगों की ऐसी धारणा है कि असम और नागालैंड के बीच जो धरती चट्टानों से भरी, दलदली और ऊंची-नीची है, वहीं पर कॉकरोच आकर रुका था, जिस कारण वह धरती ऊबड़-खाबड़ और ऊजड़ हो गई।

वह जमीन ठोस नहीं बन पाई थी और कभी भी धंस सकती थी। नागा लोग ऐसा मानते हैं कि यह वही धरती है जिसे लिजाबा ने हड़बड़ी में बनाया था। वहीं से पहाड़ों, ढलानों तथा शिखरों का सिलसिला शुरू हो जाता है।

असम और नागालैंड के बीच में बहुत बड़ी और गहरी बंजर ढलानें हैं, जिन पर कुछ नहीं उगता। वे जगह-जगह से टूटी-फूटी तो हैं ही, वे हर बरस धंस भी जाती हैं, जिससे पहाड़ों के किनारे-किनारे बड़ी-बड़ी चट्टानें और पत्थरों के टुकड़े गिर जाते हैं।

नागा लोग अपनी भौगोलिक आकृति के बारे में यह धारणा पालते हैं कि कॉकरोच के डर और लिजाबा की हड़बड़ी के कारण ही नागा देश में पहाड़ियां-ही-पहाड़ियां हैं, जबकि असम और भारत में घाटियां हैं।

असम घाटी के खत्म होते ही पूर्व की तरफ पूरा-का-पूरा पहाड़ी क्षेत्र है, जिसमें पतली लीक-सी दिखनेवाली नदियां, अत्यंत गहरी घाटियों और खंदकों में बहती हैं। लगता है यह वही स्थान है जहां, संभवतः सृष्टा ने अपना सारा गुस्सा उतारा। नागा पर्वत के शिखर से चढ़कर देखने पर बादलों से ढकी पहाड़ियां ऐसी दिखती हैं, जैसे कि परदे लटके हों।

पूर्व की तरफ बहुत धारदार चोटियां हैं। यह लिजिन्द्री और भूगोल का संगम जान पड़ता है। लोककथा और भौगोलिक नक्श, दोनों आपस में एकमएक होकर मिल गए लगते हैं। हमारा मानना है कि नागा के पूर्वजों को लिजिबा के इस सृजन कार्य का थोड़ा-थोड़ा आभास पहले से ही हो गया था।

संदर्भ: 
रमणिका गुप्ता-आदिवासी पूर्वोत्तर सृजन मिथक एवं लोककथाएं पृ 40-41

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खड़िया आदिवासी समूह की 'गोत्र-कथा'-khadiya aadiwasi samuh ki gotra katha

 

खड़िया आदिवासी समूह की 'गोत्र-कथा'


प्रस्तुति : रोज केरकेट्टा

सेमो और डकई के नी बेटे और नी बेटियाँ हुई। उसकी गाय ने तीन बछियों को जन्म दिया, जिनका नाम सुरली, सुगनी और कपाली रखा। जब बेटे जवान हुए तो सेमो को बेटों की शादी की चिंता हुई। उसने पूरव-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण छान डाला पर बेटों के लिए पत्नी नहीं ढूँढ़ सका। उदास मन से सेमो घर लौट आया।

दूसरे दिन उसने अपने बेटों को यह हिदायत देकर शिकार पर भेजा कि नीचे चलने वाले जानवर को न मारें, केवल ऊपर वाले जानवर को ही मारें। सेमो के बेटे जंगल गए पर दोपहर तक उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। दोपहर होने को आई। इन लड़कों को प्यास लगी। तब धूप से बचने के लिए वे जाकर एक बड़े पेड़ के नीचे बैठ गए।

सबसे पहले सबसे बड़ा भाई पानी की खोज में निकला। बहुत दूर एक आँवले का पेड़ दिखाई दिया। बड़ा भाई वहाँ गया, तो उसने पाया कि चट्टान के बीच में पानी है और उसमें 'डुंगडुंग मछली' तैर रही है। बड़े भाई ने पानी पीकर प्यास बुझाई और आँवले की पत्ती तोड़कर उसे रास्ते में गिराते हुए, अन्य भाइयों के पास वापस गया।

तब उससे छोटा भाई आँवले की पत्तियों को देखते हुए पानी पीने गया। वहाँ उसे एक 'कुल्लु' (कछुआ) दिखाई दिया। तीसरा भाई पानी के पास गया, तो उसे वहाँ एक केरकेट्टा (केकड़ा) दिखाई दिया। इसी प्रकार चौथे को टिटहरी (टेटेटॉहॉइज) पक्षी, पाँचवें को टोः पोः पक्षी, छठे को बाघ, सातवें को बाज (बाअः), आठवें को पत्थर (सोरेंग) और नौवें को चट्टान पर नमक मिला।

सभी भाई सुस्ता चुके तो फिर से शिकार की खोज में चले गए। उसी समय उन्हें पहाड़ के ऊपर एक हिरण दौड़ता दिखाई दिया। हिरण ऊँचाई पर दौड़ रहा था, सो भाइयों ने उसका शिकार किया। सब ने अपने-अपने हिस्से का मांस 'पोटोम' पोटली) में बाँधा और घर वापस चले आए। घर पहुँचने पर इनकी नौ बहनों ने इनके पैर धोकर स्वागत किया। जब ये घर पहुँचे तो शाम हो चली थी।

"अपनी पोटलियाँ घर के पिछवाड़े टाँग दो, मैं तुम सबसे कल मिलूँगा।" पिता ने आदेश दिया।

दूसरे दिन प्रातः स्नान करने के बाद पिता ने सब बेटों को अपनी पोटली के साथ उपस्थित होने को कहा। बेटों ने ऐसा ही किया। जब पिता ने इनकी पोटलियाँ खोली, तो प्रत्येक की पोटली में वह था, जो उन्होंने पानी पीते वक़्त जलाशय में देखा था। जब पिता ने जानवर की खाल को फैलाकर देखा, तो उसमें सूर्य और चंद्रमा की छाप दिखी। पिता आनंद-विभोर हो उठे कि पोनोमोसोर ने उसके बेटों को गोत्र दे दिया है। अब वे भाई नहीं कुटुंब हो गए हैं। तब उसने अपनी नौ बेटियों की शादी अपने नौ बेटों से कर दी। अब वे नौ गोत्रों में बँट चुके थे।

विवाह में सबसे बड़े बेटे और सबसे छोटी बेटी की शादी हुई। इस तरह तब से खड़िया लोगों ने विवाह में व्यवस्था दी कि ज्येष्ठ पुत्र और ज्येष्ठ पुत्री की शादी नहीं होगी और दूसरा गोत्र बँट जाने के बाद सगोत्रीय विवाह नहीं होगा।

टिप्पणी : सृष्टि के आरंभ में सगोत्र विवाह की प्रया थी। बाद में ही सगोत्र विवाह का निषेध हुआ है। ज्येष्ठ पुत्र एवं ज्येष्ठ पुत्री की शादी का निषेध अन्य समाजों तथा अगड़ी जातियों में भी देखने को मिलता है।
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संदर्भ: रमणिका गुप्ता-आदिवासी सृजन मिथक अन्य लोककथा पृ 149-150

शनिवार, 29 जून 2024

संताली आदिवासी लोककथा:डायन विद्या का रहस्य-santali aadiwasi lokakatha dayan vidya ka rahsya

 संताली आदिवासी लोककथा:डायन विद्या का रहस्य

प्रस्तुति : अशोक सिंह


पुराने ज़माने की बात है। एक बार सृष्टि के रचयिता ठाकुर जी ने संताल पुरुयों को एक विद्या सिखाने के लिए दरबार में बुलाया। संताल महिलाओं को इसकी भनक लग गई। 'आखिर क्या बात है कि ठाकुर जी ने सिर्फ पुरुषों को ही विद्या सिखाने के लिए बुलाया है, हम महिलाओं को नहीं? अगर हम लोगों ने विद्या नहीं सीखी तो हम पिछड़ जाएँगी। महिलाओं ने सोचा।

फिर सबने मिलकर गुपचुप ढंग से कुछ सोच-विचार करने के बाद यह तय किया कि वे लोग यह विद्या ज़रूर सीखेंगी। फिर क्या था, महिलाओं ने पुरुष का वेश धारण किया और ठाकुर जी के दरबार में पुरुषों से पहले पहुंचकर वह विद्या सीख ली। उधर संताल पुरुषों को आपसी विचार-विमर्श करने में काफी देर लग गई। सभी पोचई पीकर मस्त हो गए। वे ठाकुर जी के दरबार में देर से पहुंचे।

"तुम लोग फिर आ गए? अभी-अभी तो तुम लोगों को मैंने आदमी को तंग करने की विद्या सिखाई। फिर क्यों वापस आए हो?" ठाकुर जी ने पूछा। ठाकुर जी की बात सुनकर सब आश्वर्य में पड़ गए।

"ठाकुर जी, हम लोग पहले तो नहीं आए। अभी-अभी आ ही रहे हैं।" उन लोगों ने कहा। तब ठाकुर जी और संताल पुरुषों को बात समझ में आ गई कि जरूर महिलाओं ने पुरुष का वेश बदलकर डायन-विद्या सीख ली है। यह जानकर सब चिंता में पड़ गए।

"कोई बात नहीं। जब महिलाओं ने हमसे छल कर डायन-विद्या सीख ही लो है, तो अब हम तुम लोगों को ओझा विद्या सिखाएँगे। ठाकुर जी ने पुरुषों को आश्वस्त किया।

"मगर ठाकुर जी, ये ओझा विद्या क्या होती है?" संताल पुरुषों ने पूछा। "ओझा विद्या का मतलब तुम लोग डायन महिला द्वारा पीड़ित आदमी का झाड़-फूंककर इलाज करोगे। ठाकुर जी ने उत्तर दिया। इस प्रकार ठाकुर जी ने संताल महिलाओं को डायन और पुरुषों को ओझा के रूप में प्रशिक्षित किया। तभी से महिलाएँ डायन और पुरुष ओझा बनकर अपना-अपना करतब दिखाने लगे।


संदर्भ

रमणिका गुप्ता-आदिवासी सृजन मिथक अन्य लोककथाएं

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आपातानी आदिवासी समुदाय की 'पानकथा'-aapatani aadiwasi samuday ki pankatha


आपातानी आदिवासी समुदाय की 'पानकथा'


प्रस्तुति : फिल्मिका

बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में दो दोस्त रहते थे, जो एक-दूसरे पर जान न्यौछावर करते थे। दोनों में से एक बहुत अमीर था और दूसरा बहुत ही गरीब। गरीव दोस्त अक्सर अमीर दोस्त के यहां जाता था और जब भी जाता उसकी बहुत अच्छी खातिरदारी की जाती थी।

एक दिन उसने अपने अमीर दोस्त से कहा- "दोस्त, मैं ही तुम्हारे घर आता रहता हूं पर तुम कभी मेरे घर नहीं आते।" अमीर दोस्त ने कहा- "हां दोस्त, मैं कभी तुम्हारे घर नहीं आया क्योंकि मैं हमेशा कामों में व्यस्त रहा, फिर भी इस सप्ताह मैं तुम्हारे घर अवश्य आऊंगा।"

कुछ दिनों बाद अमीर दोस्त अपने दोस्त के घर आया। अपने अमीर दोस्त को अपने छोटे से घर में देखकर वह फूला न समाया। उसने हृदय से उसका स्वागत किया। उसके घर में खाने को कुछ न था। इसलिए उसने धीरे से अपनी पत्नी के कानों में कहा- "जाओ, जाकर किसी दुकानदार से थोड़ा चावल और कुछ खाने का सामान उधार ले आओ ताकि हम अपने दोस्त की खातिरदारी कर सकें।"

उसकी पत्नी चली गई परंतु थोड़ी देर में खाली हाथ लौट आई। पत्नी को खाली हाथ देखकर उसका पति समझ गया कि उस जैसे गरीब को किसी ने उधार नहीं दिया। वह अपने भाग्य को कोसने लगा। वह सोचने लगा "जिस दोस्त के घर से मैं हमेशा खा-पीकर लौटता हूं, उस दोस्त को मैं कुछ न खिला सका।" वह स्वयं को धिक्कारने लगा। उसने सोचा कि उसके जैसे दुर्भाग्यशाली आदमी का इस दुनिया में जिंदा रहना व्यर्थ है। उसका मर जाना ही बेहतर है।" यह सोचकर उसने रसोई में रखी छुरी उठाई और अपने सीने में भोंक ली। जब उसकी पत्नी ने देखा कि उसके पति ने छुरी मारकर अपनी जान दे दी, तो उसने भी अपना जीवन अनावश्यक समझकर उसी छुरी से स्वयं को मार डाला।

घर आए दोस्त को जब लगा कि दोनों बहुत देर तक गायब हैं, तब वह उन्हें पुकारता हुआ उनकी रसोई घर में जा पहुंचा। वहां उसने देखा कि दोनों की लाशें पड़ी हुई हैं और घर के सारे बर्तन खाली हैं। ये नजारा देखकर उसे पूरी बात समझ में आ गईं। उसने सोचा- "मेरी खातिरदारी के लिए इनके पास कुछ न होने के कारण ही, शर्म से दोनों ने अपनी जान दे दी है। मेरे कारण दोनों की जान चली गई, इसलिए मेरा भी इस दुनिया में जिंदा रहना बेकार है।" अमीर दोस्त ने भी उसी छुरी से अपनी जान ले ली। इस प्रकार तीनों मर गए।

उसी रात एक चोर, चोरी के उद्देश्य से गांव में चारों ओर घूम रहा था और चोरी के लिए कोई सूनसान घर ढूंढ़ रहा था। वही घर उसे सूना-सा लगा। चोर उस घर में घुस गया और आग जलाई। आग की रोशनी में अपने सामने तीन-तीन लाशें पड़ी देख वह चौंक गया। वह सोच में पड़ गया 'न जाने इन लोगों के साथ क्या हुआ है? लगता है कि किसी लुटेरे ने इनकी हत्या कर इनका सारा धन लूट लिया।' यह सोचते-सोचते आग की गर्माहट के कारण उसकी आंख लग गई।

गांव में चहल-पहल से उसकी आंख खुली। वह झट से उठा लेकिन भागा नहीं। उसने सोचा- 'यदि मैं यहां से निकलूंगा तो लोग मुझे हत्यारा समझकर पकड़ लेंगे और सजा भी देंगे। समाज में बदनाम होने और लोगों द्वारा थूके जाने से तो अच्छा है कि मैं भी अपनी जान दे दूं।' चोर ने भी उसी छुरी को अपने पेट में मारकर अपनी जान दे दी।

इस प्रकार चार लोगों की जानें चली गईं। ऊपर बैठा यू ब्लेई ये सब देख रहा था। तब उसने कहा- "आदमियों को अपने दोस्त की खातिरदारी खाने-पीने की महंगी वस्तुओं से नहीं करनी चाहिए क्योंकि गरीब आदमी ऐसा नहीं कर सकते। इसलिए मैं दोस्तों की खातिरदारी के लिए ऐसी दूसरी वस्तु बनाऊंगा जो सस्ती और सुलभ हो।' इस प्रकार उसने अमीर दोस्त रूपी सुपारी, गरीब दोस्त रूपी पान का पत्ता और पत्नी रूपी चूना बनाया। इसलिए लोग सुपारी को पहले खाते हैं और पान और चूना पति-पत्नी के रूप होने के कारण साथ लगाकर खाते हैं। चोर रूपी तंबाकू को सबसे बाद में खाते हैं क्योंकि चोर सबसे अंत में आया था।

आज भी मेघालय में घर-घर में यह रिवाज है कि लोग घर आए मेहमान को चाय-नाश्ता न दे सकने पर, पान-सुपारी से उसका स्वागत और खातिरदारी करते हैं।


संदर्भ:
रमणिका गुप्ता: पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथाएं

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शुक्रवार, 28 जून 2024

परहिया आदिवासी समुदाय की लोककथा: एक रोमांचक लड़ाई-parhiya aadiwasi samuday ki lokakatha: ek romanchak ladai

परहिया आदिवासी समुदाय की लोककथा: एक रोमांचक लड़ाई

उस वर्ष पलामू जिले में पशु गणना का कार्य चल रहा था और बालूमाथ प्रखंड में मुझे भी उसका पर्यवेक्षण करने का कार्य सौंपा गया था। पशु गणना के पर्यवेक्षण में एक दिन बालूमाच प्रखंड के डोरांग गाँव के लिए हेरहंज से सुबह नाश्ते के बाद मैंने स्थानीय जनसेवक, ग्रामसेवक तथा कल्याण सेवक के साथ प्रस्थान किया और पैदल मार्ग से पहाड़ी पगडंडी और घने जंगल के बीच से गुजरने वाली तंग घाटी के रास्ते हम सभी डोरांग गाँव पहुँचे। वह गाँव भी एक पहाड़ी पर बसा हुआ था जो चारों ओर से सघन वनों से घिरा हुआ था। गाँव के उत्तरी भाग में डोरांग नदी प्रवाहित होती थी।

डोरांग पहुंचने पर पूरा गाँव खाली था और कुछ महिलाएँ और बच्चे ही दिखाई पड़ रहे थे। पूछने पर पता चला कि गाँव से कुछ दूरी पर वहाँ के लोग एक वृहत भोज की तैयारी में लगे हुए थे। उत्सुकतावश हमलोग भी उसी ओर लोगों से मिलने के लिए चल दिये। वहाँ पहुंचने पर वहाँ का दृश्य देखकर मन आश्चर्य से भर गया। वहाँ एक विशालकाय जंगली सूअर को काटकर मांस का ढेर लगाया गया था और अब उसे आपस में बॉटने का कार्य शुरू होनेवाला था।

वहाँ के एक परिचित ग्रामीण को बुलाकर पूछने पर एक बड़ी ही रोमांचक घटना की जानकारी मिली। मालूम हुआ कि जिस घाटी से होकर हमलोग आये थे, उसी दिन सुबह लगभग तीन बजे एक बाघ अपने शिकार की खोज में पहाड़ी से नीचे उतरा था और घाटी में एक विशाल जंगली सूअर (वाराह) से उसकी भिड़ंत हो गयी थी। बाघ की दहाड़ और जंगली सूअर की गुराहट की आवाज से पूरा गाँव जाग गया था। दोनों का मल्लयुद्ध लगभग आधे घंटा तक चलता रहा। उसके बाद सबकुछ शांत हो गया था।

सूर्य निकलते ही गाँव के लोग टांगी, बलुआ, लाठी आदि के साथ घाटी में उतरे थे। कुछ दूर जाने पर एक झाड़ी में जंगली सूअर का क्षत-विक्षत शरीर पड़ा हुआ था और वहाँ लगभग सौ वर्गगज के क्षेत्र का झाड़-झंखाड़ दोनों के युद्ध से तहस-नहस हो गया था। गाँव के लोग दूर-दूर तक बाघ की खोज में गये थे। कुछ दूर तक घायल बाघ के खून के छींटे मिले, परन्तु घायल बाघ का कोई अता-पता नहीं चला। लोग बॉस-बल्ली की मदद से लगभग चार मन के उस वाराह (सूअर) को टाँगकर गाँव लाये थे। वह नर सूअर था और मैं उसके दाँत को प्राप्त करने का इच्छुक था। परन्तु उसके दाँतों को किसी व्यक्ति ने पहले ही निकाल लिया था। अब गाँव वाले उसके चर्बीदार मांस के लिए अधिक लालायित थे। हमलोग भी उस रणभूमि को देखना चाहते थे। इसलिए कुछ ग्रामीणों के साथ उस घाटी की ओर चल दिये, जहाँ बाघ और वाराह का मल्लयुद्ध हुआ था। घटनास्थल पर पहुँचने पर वहाँ खून के छींटे और बाघ के रोएँ चारों तरफ काफी दूर तक फैले हुए थे। लगता था कि वाराह के नुकीले और मजबूत दाँतों से बाघ भी बुरी तरह घायल हुआ होगा। वहाँ के तहस-नहस हुए वनस्पतियों को देखने से ही दोनों के मल्लयुद्ध की भयंकरता का अनुमान लगाया जा सकता था। हम सभी पशु गणना के कार्य का पर्यवेक्षण कर दूसरे सड़क मार्ग से हेरहंज वापस आ गये। आज भी बाघ और वाराह का वह रोमांचक मल्लयुद्ध का दृश्य याद आज कर मन रोमांचित हो उठता है।
संदर्भ:
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा-झारखंड की प्रमुख लोककथा पृष्ठ 237

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मेघालय के खासी आदिवासी समुदाय की लोककथा:जब मनुष्य पृथ्वी पर उतरा-meghalaya ke khasi aadiwasi samuday ki lokakatha :jab manushya pruthvi par utara


 मेघालय के खासी आदिवासी समुदाय की लोककथा:जब मनुष्य पृथ्वी पर उतरा


प्रस्तुति : विजोया सावियान

अनुवाद : अकील कैस


शिलौंग से तेरह मील उत्तर की ओर गुंबदाकार एक पहाड़ी है। नाम है लुम सोहपेत ब्नेंग जिसका अर्थ है-स्वर्ग की नाभि। खासी लोगों का विश्वास है कि उस पहाड़ी पर जिंग कीना क्सीयार या सोने की सीढ़ी स्थित थी, जो पृथ्वी को आकाश से जोड़ती थी, जैसे गर्भनाल गर्भस्थ शिशु को उसकी मां से जोड़े रखती है। उस समय मनुष्य जाति आकाश पर ही रहती थी।

तब मनुष्यों में एक प्रथा प्रचलित थी, जिसके अनुसार सभी लोगों को इस विशाल सीढ़ी से पृथ्वी पर हर दिन उतरना होता था। वे यहां दिन-भर मेहनत करते, खेती करते और फसल उगाकर लाभ कमाते और शाम होने पर उस स्वर्ण-सोपान के सहारे आकाश में लौट जाते। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा।

तब उन लोगों में से एक के मन में पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा जागी। वह आकाश में यू ब्लेई यानी सर्वशक्तिमान सृष्टा के राज्य में अब और रहना नहीं चाहता था। वह कई महीने गुप्त रूप से और सावधानीपूर्वक अपने सपने को सच में बदलने के लिए योजनाएं बनाता रहा। आखिर अपनी योजना के अनुसार, जब भी उसे अवसर मिलता वह सीढ़ी को थोड़ा-थोड़ा काटने की कोशिश में लग जाता।

एक दिन जब पृथ्वी पर आकाश से केवल सात परिवारों के लोग काम करने के लिए उतरे थे, वह व्यक्ति अपना उद्देश्य पूरा करने में सफल हो गया। जब लोग अभी खेतों में जुटे थे, उसने सीढ़ी पर पूरी शक्ति से प्रहार किया और वह नीचे आ गिरी। इस प्रकार वे सातों परिवार के लोग पृथ्वी पर सदा-सर्वदा के लिए रहने को बाध्य हुए और उस व्यक्ति का सपना साकार हुआ। कहते हैं कि दुनिया के तमाम लोग उन सातों परिवार की ही संतान हैं, जो कालांतर में समस्त महादेशों में फैल गए।

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संदर्भ: रमणिका गुप्ता- पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथाएं

गुरुवार, 27 जून 2024

कुड़ुख आदिवासी समुदाय की पशु-पक्षी और जलचर की लोककथा: शक्ति और बुद्धि की जंग-kudukh aadiwasi samuday ki lokakatha: shakti aur buddhi ki jang

 

कुड़ुख आदिवासी समुदाय की पशु-पक्षी और जलचर की लोककथा: शक्ति और बुद्धि की जंग


प्रस्तुति : ज्योति लकड़ा

एक था हाथी। एक था मगर। हाथी जंगल का राजा था और मगर पानी का। एक दिन दोनों मित्र नदी किनारे बैठकर अपनी-अपनी ताकत की बड़ाई कर रहे थे। उनके पास एक कछुआ बैठकर उनकी बातें सुन रहा था। उसे न जाने क्या सूझा कि वह हाथी और मगर के सामने आ डटा और बोला- "आप दोनों के जैसा बलवान सचमुच इस दुनिया में कोई नहीं है। पर क्या आप मेरे साथ एक शर्त लगाएँगे?" इस पर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।

"तुम मुझसे शर्त लगाओगे कछुए भाई?" हाथी ने हँसते-हँसते पूछा। "आप दोनों से ही। देखें हम तीनों में अधिक बलवान कौन है?" कछुए ने धैर्यपूर्वक कहा।

हाथी और मगर को तो विश्वास ही नहीं हुआ। पर फिर भी हाथी ने पूछा- "अच्छा तो पहले किससे शर्त लगाओगे?"

कुछ देर सोचकर कछुआ बोला- "पहले आप से, हाथी भाई।" "तो तैयार हो जाओ लड़ने के लिए।" हाथी चिंघाड़कर बोला। "मैं तो तैयार हूँ लेकिन हम कुश्ती नहीं लड़ेंगे।" कछुआ बोला।

"हाँ! कुश्ती नहीं लड़ेंगे, तो क्या करेंगे?" हाथी ने पूछा। "हम दुश्मन तो हैं नहीं। न ही दुश्मनों की तरह लड़ेंगे। हमें तो बस अपनी ताकत की जाँच करनी है।" कछुए ने समझाया।

"वह कैसे करोगे?" हाथी ने टोका।

"ऐसा करेंगे कि मैं अपने पाँव में एक रस्सी बाँधकर पानी में चला जाऊँगा और उस रस्सी के दूसरे छोर को पकड़कर आप मुझे बाहर खींचें। यदि आपने मुझे पानी से बाहर खींचकर निकाल लिया, तो मैं हारा। न निकाल सके तो मैं जीता। मंजूर है?" "मंजूर है, जा रस्सा ले आ।" हाथी ने कहा। कछुआ एक मोटा रस्सा ले आया। उसने एक सिरा पाँव में बाँधा, दूसरा सिरा हाथी को पकड़ाया। फिर नदी के भीतर चला गया। नदी बड़ी गहरी थी। उसके भीतर एक बड़ी भारी चट्टान थी। कछुए ने रस्सा चट्टान से कसकर लपेट दिया और पानी से बाहर सिर निकालकर हाथी से कहा, "हाथी भाई! अब खींचो।"

हाथी ने सोचा, कछुए को खींचने के लिए ज़ोर लगाने की क्या ज़रूरत है। उसने पहले थोड़ा सा खींचा, पर कछुआ पानी से बाहर नहीं निकला। फिर और खींचा, फिर पूरी ताकत लगा दी पर रस्सा तो हिला ही नहीं। अब तक वहाँ सभी जानवर इकट्ठा होने लगे थे। उन्हें देख हाथी को और गुस्सा आया। उसने इतनी ज़ोर से झटका दिया कि रस्सा खट से टूट गया। हाथी धड़ाम से कुलाटी खाकर ज़मीन पर गिर पड़ा। सारे पशु-पक्षी हा-हा, ही-ही, हू-हू, हैं-हैं कर हँस पड़े। हाथी क्रोध के मारे चिंघाड़ते हुए धूल उड़ाने लगा।

अब आई मगर की बारी। वह अपने साथी की हालत देखकर गुस्से से काँप रहा था। उसने ज़ोर से कहा- "कछुए, अब मैं तुझे मज़ा चखाकर रहूँगा। रस्सा ला।" "जी, समझा मगर भाई। पर इस बार आप नदी में रहेंगे और मैं ज़मीन पर। मंजूर है न?" कछुए ने कहा।

"हाँ-हाँ, मैं भी यही कहने वाला था। अब जल्दी रस्सा ला।" मगर ने कछुए से कहा।

कछुआ एक और मोटा रस्सा ले आया। एक छोर अपने पाँव में बाँधा और दूसरा मगर को दे दिया। मगर तुरंत अपना छोर पकड़कर धब से पानी में कूद गया। इस बार कछुए और मगर का दंगल देखने के लिए पानी वाले सारे जीव इकट्ठा हो गए। उघर हाथी इतने गुस्से में था कि चिंघाड़ते हुए ज़मीन वाले सभी जानवरों को वहाँ से भगा दिया और खुद भी वहाँ से चला गया।

कछुए ने देखा कि वहाँ कोई नहीं है तो उसने तुरंत रस्से को एक बड़े पेड़ के चारों ओर लपेट दिया। फिर कछुए ने जाकर ज़ोर से आवाज़ दी, "तैयार हूँ मगर भाई, खींचो।"

मगर पूरी ताकत लगाकर खींचता रहा, खींचता रहा पर कछुए को हिला नहीं सका। आख़िर में मगर ने बुरी तरह हार मान ली। इधर पानी के सभी जानवर मगर पर हँस रहे थे, "हा-हा, ही-ही, हैं-हैं।"

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संदर्भ: आदिवासी सृजन मिथक एवं अन्य लोककथाएं

असम के बोड़ो आदिवासी समुदाय की लोककथा:खेराई पूजा का आरंभ -Asam ke bodo aadiwasi samuday ki lokakatha:kherai pooja ka aarambh

 असम के बोड़ो आदिवासी समुदाय की लोककथा:खेराई पूजा का आरंभ


प्रस्तुति : फुकन चंद्र वसुमतारी 

अनुवाद : रमणिका गुप्ता


एक समय की बात है जारा फाग्ला नामक एक बूढ़ा था। लोग मजाक से उसे पगला कहते थे। उसके पांच सयाने बेटे थे। समय आने पर उन पांचों की शादी हो गई। इससे परिवार का आकार बहुत ज्यादा बढ़ गया और बूढ़े को परिवार चलाने में कठिनाई होने लगी। उसका संचित अन्न भंडार समाप्त हो गया। इसलिए एक दिन बूढ़े ने अपने बेटों से किसी उर्वर भूमि की खोजकर वहीं खेत बनाने को कहा। उसके बेटे पिता की आज्ञानुसार घर से दूर ऐसी जमीनें तलाश कर खेती करने लगे। बूढ़ा अपने मूल स्थान पर ही अपने परिवार और बहुओं की देखभाल में लगा रहा। बहुओं को वह बहुत मानता था, जैसा कि हर घर के बूढ़े बुजुर्ग करते हैं पर मोंगली नामक सबसे छोटी बहू के प्रति उसका विशेष स्नेह था (दूसरी कथा के अनुसार मोंगली सबसे बड़ी थडू थी)। माँगली न केवल अत्यधिक सुंदर थी बल्कि घरेलू कार्यों में दक्ष भी थी। यूढ़ा चाहता था कि मर्मोगली उसके सान्निध्य में रहे। वह क्या कर रही है, क्या खा रही है, वह सबका खूब ध्यान रखता। बूढ़े के इस अति स्निग्ध व्यवहार से मोंगली के मन में उसके इरादों को लेकर दुःशंका जन्मी। आखिर एक दिन भोर-भिनसरे वह घर से भाग निकली। बूढ़ा उसकी खोज में जगह-जगह की खाक छानता फिरा। उसे अपने आराम, भोजन, कपड़े लत्ते और स्वास्थ्य की भी सुध नहीं रही। लोग उसे पगला कहने लगे। कई दिनों बाद बूढ़े ने एक सपना देखा। सपने में एक बुजुर्ग से व्यक्ति ने उसे 'खाम' (ढोल), 'सेर्जा' (तारयुक्त वाद्ययंत्र), 'सिफुंग' (बांसुरी) और थाल, झांझ, मंजीरा बजा कर 'खेराइ' पूजा करने को कहा। बूढ़ा अपने पांचों पुत्रों के पास गया और पूर्णिमा की रात को विशाल धार्मिक पूजा आयोजित की। ढोल बाजे की आवाज के साथ ही एक स्त्री प्रकट हुई और दौदिनी के रूप में नृत्य करने लगी। यही स्त्री वस्तुतः मोंगली थी। 'खेराइ' पूजा की उत्पत्ति की कथा यही है। 'खेराइ' पूजा संपन्न करानेवाले बूढ़े का नाम मोनसिंग सिंग ब्राय था, जबकि सपने में आए बुजुर्ग का नाम बायी ब्राय था।

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जानकारी स्त्रोत: पूर्वोत्तर आदिवासी सृजन मिथक एवं लोककथाएं

बुधवार, 26 जून 2024

कुड़ुख आदिवासी लोककथा :नीलगाय के बच्चे-Kudukh Aadiwasi Lokakatha: Nilgay Ke Bacche

 


कुड़ुख आदिवासी लोककथा :नीलगाय के बच्चे


प्रस्तुति : कृष्णचंद टुड्डू

पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी का विवाह हुआ। विवाह होने के बाद वे दोनों चायगढ़ और चम्पागढ़ जैसे गढ़ों में रहने लगे। उनका जीवन सुखी था। इनकी बारह संतानें पैदा हुई, जिनमें लड़के और लड़कियाँ दोनों शामिल थे। सबसे बड़ी लड़की का नाम 'हिसी' था।
बच्चों को पालते हुए वे दोनों पति-पत्नी नदी के किनारे खेती-बारी करने लगे। वे 'इड़ी" 'गोंदली' व 'एरबा" अनाज की फसलें उगाने लगे। बड़ी लड़की हिसी भी खेती-बारी में उनका हाथ बँटाने लगी।
फसल होने पर हर रोज़ एक 'मुरूग' (नीलगाय) अपने बच्चों के साथ उनके खेत में इड़ी व एरबा अनाज खाने आने लगी थी। पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी इससे दुखी व परेशान हो गए थे। उन्होंने जंगली नीलगाय को खेत में न आने देने के लिए एक तरकीब सोची। अगले दिन उन्होंने नीलगाय के खेत में आने के रास्ते में 'सुलाख खूँटी' (कँटीली लकड़ी) गाड़ दी।
जब जंगली नीलगाय आई और सुलाख खूँटी को लाँघकर पार करने लगी, तो खूँटी उसके पेट में घुस गई। वह छटपटाने लगी और दौड़कर सीता नाला और सालगाड़िया (डोभा) का पानी पीने लगी। पानी पीकर वह सहारबेड़ा (नदी के किनारे मैदानी क्षेत्र) के पास पहुँची ही थी कि मर गई। नीलगाय के बच्चे ने सीता नाला और सालगाड़िया तक तो उसका पीछा किया लेकिन तेज़ी से न दौड़ पाने के कारण वह अपनी माँ से बिछुड़ गया। 
माराङ बुरू को नीलगाय के बच्चे पर दया आ गई। उन्होंने अपनी शक्ति से नीलगाय के बच्चे को आदमी बना दिया। तभी से वह आदमी के रूप में रहने लगा। इधर पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी के बच्चे नीलगाय को खोजने लगे। खोजते-खोजते वे 'सहारबेड़ा' पहुँचे। उस समय पिलचू हड़ाम एवं पिलचू बूढ़ी सहारबेड़ा जंगल में पत्ते तोड़ने गए थे। वहीं आदमी के रूप में रह रहा नीलगाय का बच्चा उन्हें मिला। वह सालगाड़िया में मछली और केकड़े पकड़ रहा था।
पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी के बच्चे 'सारजोम' (सखुआ) पेड़ के नीचे मरी हुई गाय को काट रहे थे। सब लोग वहीं इकट्ठे हो गए। आदमी का जीवन जी रहा नीलगाय का बच्चा एक पत्थर पर बैठ गया। बाकी लोगों से उसकी मित्रता हो गई, उसके द्वारा पकड़े मछली और केकड़े भी पकाए गए, जिन्हें बाद में सभी एक साथ मिलकर खाने लगे।
जब पिलचू हड़ाम, पिलचू बूढ़ी व उनके बच्चे नीलगाय का मांस खा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि नीलगाय का बच्चा चुन-चुनकर मछली एवं केकड़ा खा रहा है और नीलगाय के मांस को छोड़ दे रहा है।
यह देखकर पिलचू हड़ाम ने कहा, "यह बच्चा निश्चित तौर पर नीलगाय का बच्चा है। इसलिए इसे 'मुरमू' का गोत्र ही दिया जाए।"
उसके बाद पिलचू हड़ाम और पिलचू बूढ़ी ने 'पेटेरबाड़े' (बरगद) पेड़ के नीचे बैठकर गोत्रों का विभाजन किया। बारह बच्चों के हाथ में बारह तरह के जीव-जंतु व चीजें पाई गईं। उन्हीं के आधार पर बारह गोत्रों का नामकरण हुआ।
'हास' चिड़िया से 'हासदाः', 'मारडी' घास (एक विशेष प्रकार की घास का नाम, जो धान जैसी लगती है और उसी के साथ उगती है) से 'मारडी', लाठी से 'सोरेन', 'गुआ' (सुपारी) से हेम्ब्रम, 'टुःटुकुर' चिड़िया से 'टुडू', 'किकिर' चिड़िया से 'किस्कू', बासी भात से 'बास्के' आदि गोत्रों का नामकरण हुआ।
विशेष संज्ञा:
1. इड़ी-एक प्रकार का मकई जैसा अनाज।
2. गोंदली-एक प्रकार का अनाज जो छोटे-छोटे दाने वाला होता है।
3. एरवा-एक प्रकार का बाजरे जैसा अनाज ।

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संदर्भ:
रमणिका गुप्ता- आदिवासी सृजन मिथक एवं अन्य लोककथाएं

मिज़ो आदिवासी लोककथा: छूरा के सींग-Mijho Aadiwasi Lokakatha :chhura ke sing


 मिज़ो आदिवासी लोककथा: छूरा के सींग

प्रस्तुति : डॉ. एल.टी. लियाना खियांगते
अनुवाद : सारंग कुमार

एक गांव में छूरा नाम का बहादुर और विनोदप्रिय व्यक्ति रहता था। उसका सबसे अच्छा मित्र उसका सगा भाई नहाइया था, जिसे ना के उपनाम से पुकारा जाता था। यह छूरा की मूर्खता और लापरवाही का लाभ उठाने में माहिर था। दोनों भाइयों का मुख्य पेशा खेती था। उनके धान के खेत गांव से कुछ ही दूरी पर थे। नहाइया के खेत के कोने पर एक बहुत बड़ा पेड़ था, जिस पर भोजन की खोज में आनेवाले पक्षी विश्राम किया करते थे। नहाइया चिड़ियों का चहचहाना बर्दाश्त नहीं करता था और पत्थरों या अपने हथियार 'साइरोखे' से उन चिड़ियों का शिकार किया करता था।

भाग्य या दुर्भाग्यवश नहाइया द्वारा फेंका गया पत्थर पेड़ की खोखर में चला गया। उस खोखर में एक प्रेतात्मा अपने बच्चों के साथ रहती थी। पत्थर से भूतनी घायल हो गई। उसे गुस्सा आ गया और हमलावर को उसने अपनी अदृश्य शक्ति से बदला लेने की चेतावनी दी। उसने अज्ञात भाषा में हमलावर को डराने के लिए तरह-तरह की ध्वनियां निकालीं।

प्रेतात्मा का गुस्सा देख चालाक नहाइया ने उस खेत को बेचने का मन बना लिया ताकि वह उस भूतनी के शाप से बच सके। उसने सोचा कि खेत के नए मालिक को ही यह शाप लगेगा। नहाइया ने अपने छोटे भाई छूरा के सामने झूमवाले खेत को बदलने का प्रस्ताव रखा। अपना खेत दिखाने के बाद उसने छूरा से कहा कि वह खेत ले ले और बदले में दूसरा खेत उसे दे दे। भोला-भाला छूरा भाई की बात मान गया। अगले दिन छूरा अपने नए खेत पर गया। नहाइया के कहे मुताविक छूरा ने खेत में एक पेड़ खड़ा पाया, जिसकी शाखाओं पर बहुत-सी चिड़ियां बैठी थीं। उसके मन में कुछ चिड़ियों का शिकार करने का लालच आ गया। उसने चिड़ियों को निशाना बनाकर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। पहले की तरह ही प्रेतात्मा ने अज्ञात भाषा में कुछ कहना शुरू किया, क्योंकि उन पत्थरों से उसके बच्चों को चोट पहुंच रही थी। पूरा ने प्रेतात्मा की चेतावनी को अनसुना कर दिया और चिड़ियों पर लगातार पत्थर फेंकता रहा। भूतनी ने महसूस किया कि खेत का नया मालिक काफी साहसी है, इसलिए उसे डराकर भगाना आसान नहीं है। वह खोखर के एक कोने में दुबक गई और छूरा को माफ कर दिया। अब वह उस खोखर के पास पहुंच गया जहां से अपरिचित आवाज आ रही थी। उसने खोखर में झांककर देखा उसमें बच्चे तो थे, पर मां गायब थी। छूरा ने खोखर में से एक-एक बच्चे को निकाला और निगलना शुरू कर दिया। देखते-ही-देखते भूतनी के सारे बच्चे मर गए। वहां से आकर वह खेत की झोपड़ी में छुप गया। भूतनी अपने बच्चों की मौत पर खूब रोई। अब छूरा ने प्रेतात्मा को भी पकड़ने की योजना बनाई। उसने झोंपड़ी में एक झूला बनाया और स्वयं अलग जाकर छुप गया ताकि प्रेतात्मा को लगे कि घर चला गया है। कुछ समय बाद भूतनी झोंपड़ी में बने झूले पर आकर बैठ गई और खुद को अकेली महसूस कर एक दर्दभरा गीत गाने लगी। वह बिना देरी किए बाहर निकला और झट भूतनी के बाल कसकर पकड़ लिए। उसने प्रेतात्मा को गांव में ले जाकर उससे बच्चों का मनोरंजन कराने की धमकी दी। भूतनी ने उससे ऐसा न करने की गुहार की और उसे छोड़ने के एवज में एक तलवार भेंट करने का वादा किया। उसने जवाब दिया कि उसके पास पहले से ही एक कुल्हाड़ी है। फिर भूतनी ने उसे एक कुदाल का लालच दिया, परंतु उसने इसे भी लेने से इनकार कर दिया, क्योंकि इसे चलाने के लिए बड़ी ताकत की जरूरत होती है। भूतनी यह सोचकर भय से कांप रही थी कि गांव में बच्चों के सामने उसकी क्या गत बना दी जाएगी। इसलिए उसने उसे अपनी सबसे कीमती वस्तु जादू का सींग देने का लालच दिया। छूरा ने इस प्रस्ताव को खुशी से स्वीकार कर लिया। वह जानता था कि बिना प्रयास के ही इस सींग के एक छोर से खाना बनाया जा सकता है और दूसरे छोर से गोश्त उबाला जा सकता है।

जादू के सींग का महत्त्व जानकर छूरा ने भूतनी को छोड़ दिया और सींग लेकर घर चला गया। इस कीमती सींग के जरिए छूरा व उसके परिवार को मुफ्त में ही पूरे दिन का स्वादिष्ट भोजन मिलने लगा। पूरे परिवार ने अब काम करना बंद कर दिया और परिवार के सभी सदस्य लापरवाही से लड़ने लगे। जब नहाइया को भाई के पास जादू के सींग होने का पता चला, तो उसे छूरा से ईर्ष्या होने लगी। कुछ दिन बाद नहाइया ने छूरा से यह सींग ले लेने की चाल चलनी शुरू कर दी। उसने छूरा को चेताया कि तुम्हारे घर में कभी भी आग लग सकती है, इसलिए यह सींग फेंक दो। एक दिन नहाइया ने छूरा के घर के पास सूखे बांस व केन की लकड़ियों का ढेर लगाकर उसमें आग लगा दी और आंगन में आकर "आग... आग..." चिल्लाने लगा। उसने छूरा से कहा कि आग उसी जादू के सींग के कारण लगी है, इसलिए उसे लेकर बाहर आने के लिए कहा। छूरा जल्दी से बाहर निकला, पर दरवाजे पर ठेस लगने के कारण गिर पड़ा। सींग उसके हाथ से छूटकर दूर जा गिरा। नहाइया इसी मौके की तलाश में था। उसने झपटकर सींग उठा लिया और चलता बना।
इस घटना से छूरा काफी दुःखी था। वह सींग वापस लेना चाहता था। इसके लिए उसने भी एक योजना बनाई। नहाइया की तरह ही उसने भी उसके घर पहुंचकर यह बात दोहराई कि जब घर में आग लग जाए तो सबसे पहले सींग को लेकर घर से भाग जाना चाहिए। कुछ समय बाद छूरा ने नहाइया के घर के बाहर आग लगा दी और उसी अंदाज में चिल्लाने लगा। हालांकि नहाइया ने सोच रखा था कि छूरा की बात में आना नहीं है, इसलिए उसने भाई की बात पर ध्यान नहीं दिया और पास पड़ा पत्थर का मूसल उठाकर भागते हुए गिरने का अभिनय कर मूसल को छूरा की ओर फेंक दिया। मूसल छूरा की पिंडली की हड्डी पर जा लगा। दर्द से वह बिलविला उठा और भुनभुनाते हुए कहा, "मुझे वही चीज रखनी है जो नहाइया को नापसंद है।" नहाइया अपने छोटे भाई छूरा से काफी चालाक निकला। उसने भाई को सींग नहीं लौटाया और जादू-भरी उस वस्तु का भरपूर फायदा उठाया। अब वह प्रतिदिन एक-से-एक स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेने लगा।

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